जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल ने चीन के प्रति जो रुख अपनाया है, उससे मुमकिन है कि यूरोप में बहुत से देश सहमत नहीं होंगे। अमेरिका के इससे सहमत होने की संभावना तो और भी कम है। मैर्केल ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की इस राय से सहमति जताई है कि अमेरिका और यूरोप को चीन के साथ शीत युद्ध शुरू नहीं करना चाहिए। हालांकि इसके साथ ही उन्होंने यह जोड़ा कि वे मानव अधिकार और पारदर्शिता के मुद्दों पर चीन पर दबाव डालती रहेंगी।
एंजेला मार्केल ने अपनी ये राय वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के सम्मेलन को संबंधित करते हुए जताई। मंगलवार को इस फोरम को संबोधित करते हुए शी जिनपिंग ने शीत युद्ध का विरोध किया था। बुधवार को अपने भाषण में एंजेला मार्केल ने कहा- ‘चीन के राष्ट्रपति ने कल अपना भाषण दिया था। मैं उनकी बात से सहमत हूं। हमें बहुपक्षीय सहयोग की जरूरत है।’
राजनयिक विश्लेषकों ने कहा है कि मार्केल ने इस बारे में अपनी समझ दो-टूक लहजे में रखी है कि यूरोप को चीन के साथ अपने रिश्तों में क्या नजरिया अपनाना चाहिए। उन्होंने अपनी राय उस समय जताई है, जब कई हलकों से ऐसे सुझाव दिए जा रहे हैं कि चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका और यूरोप को गठबंधन बना लेना चाहिए।
गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस हफ्ते कई यूरोपीय नेताओं से फोन पर बात की है। इन नेताओं में एंजेला मार्केल और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी शामिल हैं। बताया जाता है कि इन वार्ताओं के दौरान बाइडन ने चीन के मामले में साझा रणनीति अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि रूस और पश्चिमी एशिया के साथ-साथ चीन भी उनकी विदेश नीति संबंधी प्राथमिकता है। गौरतलब है कि यह बात व्हाइट हाउस के वक्तव्य में कही गई। लेकिन यूरोपीय राजधानियों में जारी बयानों में चीन का जिक्र नहीं किया गया।
यूरोप में जर्मनी की सबसे अहम हैसियत है। इसलिए जर्मनी का क्या रुख रहता है, इस पर सबकी निगाह होती है। इससे काफी कुछ तय होता है कि यूरोपियन यूनियन का क्या स्टैंड रहेगा। एंजेला मार्केल की इस टिप्पणी को इस लिहाज से अहम माना गया है कि वे गुट बनाने से बचना चाहती हैं। उन्होंने कहा- “मेरी राय में यह कहना बहुत से समाजों के साथ न्याय नहीं होगा कि यह चीन है और यह अमेरिका है और हम इनमें से किसी एक साथ गोलबंद हो रहे हैं। मेरी समझ में चीजें ऐसे नहीं चलनी चाहिए।”
इस साल वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम का सम्मेलन ऑनलाइन हो रहा है। इस बार इसके तीन प्रमुख वक्ताओं में मार्केल, मैक्रों और शी शामिल थे, जिन पर पर्यवेक्षकों की निगाहें टिकी थीं। इसकी वजह यूरोपयिन यूनियन और चीन के संबंध को लेकर जारी अनिश्चितता है। हालांकि दोनों पक्षों ने पिछले महीने व्यापक निवेश समझौते को मंजूरी दी, लेकिन इस बारे में अभी भी अनिश्चितता है, क्योंकि यूरोप के कई हलकों से इसका विरोध हुआ है।
शायद उन्हीं हलकों को संतुष्ट करने की कोशिश में मार्केल ने कहा कि जर्मनी मानव अधिकार और पारदर्शिता के मुद्दों को लेकर चीन पर दबाव डालता रहेगा। उन्होंने कहा- चीन के राष्ट्रपति संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र और व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करने के प्रति अपनी वचनबद्धता जताई है। हम चाहे जिस तरह की सामाजिक व्यवस्था में रहते हों, हमें इन मुद्दों पर चर्चा करनी होगी।
उन्होंने कहा कि बहुपक्षीय सहयोग के लिए पारदर्शिता अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 के बारे में चीन ने जानकारी देने में जो कोताही बरती, वह पारदर्शिता में कमी की मिसाल है। इसके बावजूद मार्केल ने चीन के साथ हुए व्यापक निवेश समझौते का समर्थन किया। विश्लेषकों के मुताबिक यही असली बात है। इसका मतलब है कि मार्केल इस समझौते के पक्ष में मजबूती से खड़ी हैं। इससे इसके अमल में आने की संभावना बढ़ जाती है।