जर्मनी के बाडेन-वुटमबर्ग प्रांत में 14 मार्च को हुए चुनाव में ग्रीन पार्टी विजयी रही। जबकि ये प्रांत कार उद्योग का मुख्य केंद्र है। यहां मिली सफलता को ग्रीन पार्टी ने इस बात का संकेत माना है कि देश का आम जनमत अब आर्थिक नुकसान की कीमत पर भी पर्यावरण बचाने की नीतियां लागू करने का समर्थक हो गया है। ग्रीन पार्टी ने एंजेला मर्केल को एक थकी हुई सरकार और घटना के बाद प्रतिक्रिया जताने वाली पार्टी का नेता करार दिया है।
पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर ग्रीन पार्टी के इस आक्रामक रुख से सीडीयू दबाव में आती दिख रही है। पार्टी के प्रमुख नेता और सांसद नॉबर्ट रोटजेन ने वेबसाइट पोलिटिको.ईयू से कहा कि ग्रीन पार्टी के लिए बढ़ रहे समर्थन को नजरअंदाज करने से अब काम नहीं चलेगा। अब अर्थव्यवस्था को जलवायु संरक्षण के कदमों से अलग दिखाना कारगर नहीं होगा। इसके विपरीत जरूरत इस बात की है कि सीडीयू ऐसी विवेकपूर्ण जलवायु संरक्षण और आर्थिक नीति पेश करे, जिससे लोगों को लगे कि ये दोनों बातें एक दूसरे की विरोधी नहीं हैं।
लेकिन पार्टी का कंजरवेटिव धड़ा सख्त समयसीमा मंजूर करने को तैयार नहीं दिखता। परिवहन मंत्री आंद्रेस शुएर ने हाल में सुझाव दिया कि गैसोलाइन और डीजल कारों को चरणबद्ध ढंग से 2035 तक हटाने की नीति लागू की जानी चाहिए। मर्केल की सरकार में मंत्री रह चुके हिल्डगार्ड मूलर ने कहा है कि समस्या इंजन नहीं, बल्कि ईंधन है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि अक्षय ऊर्जा और कार्बन डायऑक्साइड से मुक्त स्रोतों से प्राप्त ऊर्जा को लेकर सिंथेटिक ईंधन तैयार किया जाए। लेकिन सीडीयू गठबंधन के भीतर जहां इस मुद्दे पर अभी सुझाव दिए जा रहे हैं, वहीं ग्रीन पार्टी ने अपना एजेंडा सामने रख दिया है। इससे अगले चुनाव में सत्ताधारी गठजोड़ के लिए एक कठिन चुनौती उभर कर सामने आ गई है।