Campaign against Genitial mutilation
हाल ही में आईएस का दंश झेल चुके इराक के कुर्द गांवों में अब औरतों ने खतने के खिलाफ आवाज बुलंद करना शुरू कर दिया है। कुर्द समुदाय के इलाके में महिलाओं और बच्चियों के खतने के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाने वाले एनजीओ वादी से जुड़ी रसूल नामक महिला ने इसे सफल बनाने की शपथ ली है। वह कुर्द गांवों में कई बच्चियों के लिए देवदूत के समान बन गई है।
मौजूदा दौर में कुर्द गांव में सर्दी के दौरान बादलों और बारिश के आसार के बावजूद रसूल एक घर के बंद दरवाजे के बाहर खड़ी है। वह वहां से हिलने को भी तैयार नहीं है, क्योंकि उसे डर है कि उसके जाने के बाद घर के लोग अपनी दो बच्चियों का खतना कर देंगे।
बचपन में खतने का दंश झेल चुकीं 35 वर्षीय रसूल ने आवाज लगाई कि मुझे मालूम है कि आप घर में हैं। मुझे सिर्फ बात करनी है। उसके साथ क्षेत्र की कुछ अन्य महिलाएं भी वादी के बैनर तले महिलाओं की परंपरावादी सोच को बदलने का संकल्ल ले चुकी हैं। इसी कारण अब पूरे इराक के मुकाबले कुर्द क्षेत्र में बच्चियों के खतने की संख्या में कमी आई है।
एक समय ऐसा भी रहा है जब कुर्द इलाकों में बच्चियों के बीच खतना एक सामान्य बात रही है। क्षेत्रीय राजधानी इरबिल के पूर्व में स्थित शरबती साघिरा गांव में खतने के खिलाफ जागरूकता फैलाने और इस परंपरा को बंद कराने के लिए अकेली रसूल यहां 25 मर्तबा जा चुकी हैं।
वह गांव के इमाम की सोच को बदलने की कोशिश कर रही हैं, जो सोचते हैं कि खतना इस्लामिक परंपरा है। वह गांव की प्रशिक्षित दाईयों को खतने से होने वाले नुकसान, उसके कारण वर्षों तक होने वाले रक्तस्राव, संक्रमण के खतरों और मानसिक प्रताड़ना के संबंध में समझाती हैं।
खतने को घरेलू हिंसा कानून में किया शामिल
खतने के खिलाफ महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे तमाम अभियानों के बाद कुर्द प्राधिकार ने 2011 में खतने को घरेलू हिंसा कानून के तहत शामिल कर लिया। इस कानून के मुताबिक खतना करने वालों के लिए अधिकतम तीन साल की सजा और करीब 80,000 अमेरिकी डॉलर के जुर्माने का प्रावधान किया गया। कानून बनने और एनजीओ के अभियानों के बाद खतने की संख्या में कुछ कमी भी आई है।