फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Nepal: इस संकट से कैसे बाहर निकलेगा नेपाल? 17 साल में अबतक कोई प्रधानमंत्री नहीं पूरा कर पाया है कार्यकाल

सार

नेपाल के ऐसे हालात भारत के लिए चिंता का कारण हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय नेपाल के हालात पर लगातार नजर बनाए है। विदेश मामलों के वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार कहते हैं कि पिछले दो साल से नेपाल को लेकर खबर अच्छी नहीं आ रही थी।  
विज्ञापन
नेपाल में विरोध प्रदर्शन - फोटो : पीटीआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

नेपाल फिर संकट में फंस गया है। अस्थिरता और विरोध प्रदर्शन काफी उग्र हो गए हैं। वहां राजशाही के खात्मे के बाद 17 साल में कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। यूक्रेन-रूस संघर्ष के बाद ऊर्जा सुरक्षा की चिंताओं ने नेपाल के हालात को तेजी से खराब कर दिया। अब नेपाल की जनता सड़कों पर है। आखिर कैसे इस संकट से बाहर आएगा नेपाल?

विज्ञापन


नेपाल के ऐसे हालात भारत के लिए चिंता का कारण हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय नेपाल के हालात पर लगातार नजर बनाए है। विदेश मामलों के वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार कहते हैं कि पिछले दो साल से नेपाल को लेकर खबर अच्छी नहीं आ रही थी। रंजीत कुमार कहते हैं कि नेपाल में लोगों का असंतोष बढ़ रहा था। सरकार इसको लेकर संवेदनशील नहीं थी।

नेपाल में लोगों को पता था कि एक दिन फूटेगा जनता का गुस्सा
संतोष कुमार बिराहे काठमांडू से हैं। संतोष का कहना है कि जनता का यह आक्रोश दो-तीन महीने पहले भी भड़कने की पूरी संभावना थी। वहां गांवों में लोगों को तमाम संकटों का सामना करना पड़ रहा है। युवाओं में लगातार बेरोजगारी बढ़ रही है। कोविड-19 के बाद से नेपाल के युवकों का रोजगार के लिए दूसरे देशों में जाने की संभावना काफी हुई और वहां के घरेलू बाजार में कामकाज के सीमित अवसर हैं। मंहगाई की मार से आम जनता त्रस्त है। बिराहे बताते हैं कि गांवों में की स्थिति काफी खराब है। अनमोल भट्टराई नोएडा में रहते हैं। काठमांडू में विरोध प्रदर्शन को लेकर कहते हैं कि यह वहां सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर  प्रतिबंध लगने से नहीं हुआ है। बल्कि नेपाल के आंतरिक हालात का नतीजा है। नेपाल में भ्रष्टाचार चरम पर है। आम जनता की सुनने वाला कोई नहीं है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के राज से लोग खुश नहीं हैं। नेपाल में एक तबका अब फिर राजशाही के समर्थक के रूप में उभर रहा है। नेपाली कांग्रेस की उम्मीदें भी बढ़ी हैं। इसका एक बड़ा कारण वाम दलों में(सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन-एमसी) आपसी सहमति का न बनना भी है। केपी शर्मा ओली और पुष्प कुमार दहल, प्रचंड की धारा भी नहीं मिल पा रही है।
विज्ञापन


17 साल में कोई भी सरकार नहीं पूरा कर पाई कार्यकाल
नेपाल में 2008 में राजशाही सत्ता से बाहर हुई थी। पुष्प कुमार दहल प्रचंड देश के प्रधानमंत्री बने थे, लेकिन दहल की सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी। केपी शर्मा ओली की सरकार पर भी अब संकट के बाद हैं। नेपाल के गृहमंत्री ने हालात की गंभीरता को देखते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। अनमोल के मुताबिक, काठमांडू की सडकों पर सेना तैनात कर दी गई है। नाम न छापने की शर्त पर काठमांडू में तैनात भारत के एक पूर्व राजदूत ने कहा कि धीरे-धीरे स्थिति स्थानीय प्रशासन के नियंत्रण से बाहर हो रही है। वहां लोकतंत्र समर्थक दलों में आपस में तालमेल नहीं बन पा रहा है। दूसरे राजशाही समर्थक एक बार फिर नेपाल में काफी कुछ अपने हित में बदलता हुआ देख रहे हैं। एक वर्ग ऐसा भी है जो नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र बनते हुए देखना चाहता है। गौतम घिमिरे कहते हैं कि देखिए राजनीति अपनी जगह है। मुख्य सवाल जनता से जुड़ी सहूलियतों का है। नेपाल के विकास का है। वह अटका पड़ा है। कभी संविधान के मुद्दे जोर पकड़ लेते हैं तो कभी राजशाही समर्थकों का प्रदर्शन। फिर बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी, आर्थिक तनाव, भ्रष्ट्राचार जनता में नाराजगी को काफी बढ़ा देता है।

संकट से कैसे बाहर आएगा नेपाल,क्या बदलेगी  सरकार?
गौतम घिमिरे कहते हैं कि कोई बहुत आसान रास्ता नहीं है। नेपाल के लोगों के सामने जीवन-यापन का संकट है। युवाओं को बेहतर शिक्षा और रोजगार चाहिए। संविधान एक बड़ा मुद्दा है। वह कहते हैं कि केपी शर्मा ओली की सरकार से लोगों को उम्मीदें थी। उनपर पानी फिर गया है। हालांकि घिमरे कहते हैं कि लोकतंत्र में कोई खूनी क्रांति नहीं होती। जनता विरोध प्रदर्शन करती है। नाराजगी व्यक्त करती है, सरकारें बदलती है और एक बार फिर गाड़ी आगे बढ़ जाती है। रंजीत कुमार भी कहते हैं कि अभी तो कुछ दिन जनता विरोध प्रदर्शन करेगी। ऐसा लग रहा है कि कल से प्रदर्शन और उग्र हो जाएगा। लेकिन कुछ दिन बाद वहां के हालात बदल सकते हैं।
विज्ञापन

 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें