गांबिया द्वारा जारी अर्जी में मुकदमे का फैसला आने से पहले के दौरान की अवधि के लिए मौजूद प्रावधानों का हवाला देते हुए जैनोसाइड कन्वेंशन के तहत रोहिंग्या समुदाय और गांबिया के अधिकारों की हिफाजत करने की गुजारिश भी की गई है।
साथ ही न्यायालय का अंतिम निर्णय आने तक विवाद को और ज्यादा बढ़ने से रोकने के उपाय करने का भी निवेदन किया गया है, इसलिए गांबिया ने न्यायालय से म्यांमार को ये उपाय करने का अंतरिम आदेश जारी करने का आग्रह किया है।
9 दिसंबर 1948 के जैनोसाइड कन्वेंशन के प्रावधानों के अंतर्गत म्यांमार को ऐसी तमाम गतिविधियों को रोकने के लिए हर संभव उपाय करने होंगे जो नरसंहार के अपराध या इसी स्तर की गतिविधियों में गिनी जा सकती हों। साथ ही ऐसे जनसंहारक कृत्य भी अपनी पूरी ताकत लगाकर रोकने होंगे जोरोहिंग्या समुदाय के लोगों के खिलाफ करने का अंदेशा हो।
इनमें न्यायेत्तर हत्याएँ, शारीरिक शोषण, बलात्कार या अन्य रूपों में यौन हिंसा, घरों या गाँवों का जलाना, पालतू जानवरों और जमीन को तबाह किया जाना, लोगों को भोजन सहित जिंदगी की अन्य बुनियादी जरूरतें पूरी करने से रोकना, या लोगों के जीवन को नुकसान पहुँचाने वाली किसी भी तरह की अन्य गतिविधियाँ जिनसे रोहिंग्या समुदाय के वजूद को आंशिक या पूर्ण रूप से तबाह करने के इरादे से की जाए।
म्यांमार को ये सुनिश्चित करना होगा कि सेना, अर्द्धसैनिक बल या अनियमित सशस्त्र यूनिट, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के आदेशों और निर्देशों पर काम करते हों, उनका कोई भी सदस्य रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ किसी भी जनसंहारक गतिविधि में शामिल ना हो, जनसंहार करने के किसी षडयंत्र में शामिल ना हों और ना ही किसी को जनसंहारक गतिविधियाँ करने के लिए उकसाने में शामिल हों।
इनमें न्यायेतर हत्याएं शारीरिक उत्पीड़न, बलात्कार और यौन हिंसा के अन्य रूप, घरों और गाँवों को जलाना, जमीन और पालतू जानवरों को तबाह करना, लोगों को भोजन सहित जिंदगी की अन्य बुनियादी जरूरतें पूरी करने से रोकना, या लोगों के जीवन को नुकसान पहुँचाने वाली किसी भी तरह की अन्य गतिविधियाँ जिनसे रोहिंग्या समुदाय के वजूद को आंशिक या पूर्ण रूप से तबाह करने के इरादे से की जाए।
गांबिया की अर्जी में न्यायालय से ये भी अनुरोध किया है कि म्यांमार को इस मामले से संबंधित किसी भी तरह के सबूतों को मिटाने से रोका जाए।
अर्जी में ये भी कहा गया है कि गांबिया और म्यांमार ऐसी किसी भी कार्रवाई या गतिविधि से बचेंगे जिससे इस विवाद के और भड़कने या बढ़ने या इसके समाधान को और ज्यादा मुश्किल बनने की आशंका हो।
म्याँमार और गांबिया अंतरिम उपायों की स्थिति के बारे में चार महीने के भीतर न्यायालय को रिपोर्ट मुहैया कराएंगे।
हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना यूएन चार्टर के अनुसार जून 1945 में हुई थी और इसने अपना कामकाज अप्रैल 1946 में शुरू किया था। ये संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक हैं जो एक तरह से संयुक्त राष्ट्र की न्यायिक संस्था है।
इस न्यायालय में 15 जज होते हैं जिनका चुनाव संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद द्वारा 9 वर्ष के लिए किया जाता है। इस न्यायालय का मुख्यालय नीदरलैंड के शहर हेग में है।
न्यायालय मुख्य रूप से दो काम करता है - किन्हीं देशों के बीच विवादों का अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार समाधान निकालना और उनके खिलाफ कहीं कोई अपील नहीं हो सकती।
दूसरा ये कि संयुक्त राष्ट्र का कोई संगठन या एजेंसी अगर कोई मामला या कानूनी प्रश्न न्यायालय की राय जानने के लिए दाखिल करते हैं, तो उन पर अपनी सलाहकारी राय मुहैया कराना।