जी-20 देशों के अगले शिखर सम्मेलन के मेजबान इंडोनेशिया की मुश्किल बढ़ती जा रही है। रूस ने कुछ रोज पहले यह स्पष्ट कर दिया कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जी-20 शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने यूक्रेन पर हमले के कारण रूस को जी-20 से निकालने का खुलेआम इरादा जताया है। उधर, चीन ने दो टूक कहा है कि किसी भी देश को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी अन्य देश को जी-20 से निकालने की बात करे।
जी-20 का गठन 1999 में हुआ था। तब से ऐसे हालत कभी पैदा नहीं हुए, जिससे किसी एक सदस्य देश की भागीदारी को लेकर आज जैसा विवाद खड़ा हुआ हो। जकार्ता स्थित रूसी राजदूत ने हाल में बताया कि पुतिन जी-20 शिखर सम्मेलन के लिए इंडोनेशिया के आमंत्रण को स्वीकार करेंगे। उन्हें ये आमंत्रण जी-20 की रोम में हुई पिछली बैठक के दौरान दिया गया था। रूसी राजदूत के इस बयान के तुरंत बाद ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने इस पर अपना विरोध जताया। उन्होंने कहा- जी-20 में की बैठक में पुतिन शामिल हों, अब यह बेहद मुश्किल है।
इस टकराव को देखते हुए इंडोनेशियाई मीडिया में कहा जा रहा है कि जी-20 की मेजबानी राष्ट्रपति विडोडो के लिए गले की हड्डी बनने जा रहा है। इससे वे तभी बच सकते हैं अगर पुतिन खुद इस बैठक में आने से मना कर दें। वरना, विडोडो को दो विरोधी पक्षों में से किसी एक का चुनाव करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, तो उनके लिए बेहद कठिन परीक्षा होगी।
यूक्रेन संकट को लेकर इंडोनेशिया का रुख नरम रहा है। बीते 24 फरवरी को यूक्रेन में रूसी सैनिक कार्रवाई शुरू होने के बाद जारी बयान में इंडोनेशिया ने इसे ‘अस्वीकार्य’ कहा था। लेकिन उसने इसकी निंदा नहीं की थी। इंडोनेशिया के रूस के साथ पारंपरिक रिश्ते रहे हैं। जी-20 के मेजबान के रूप में उसकी एक परेशानी यह भी है कि पुतिन को रोकने की कोशिश होने पर चीन भी बैठक में आने से मना कर सकता है। उस स्थिति में ये बैठक की अहमियत और घट जाएगी।
कुछ विशेषज्ञों ने इंडोनेशिया के रुख में अस्पष्टता का कारण देश की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी में मौजूद अमेरिका विरोधी भावना को भी माना है। इंडोनेशिया के मीडिया में भी आम तौर पर रूस के प्रति सहानुभूति देखने को मिली है। कई इंडोनेशियाई टीकाकारों ने यूक्रेन में भड़के युद्ध के लिए नाटो के विस्तार की कोशिशों को जिम्मेदार ठहराया है।