फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

श्रीलंका: चीन से दोस्ती बढ़ाना पड़ रहा है महंगा, लोकतांत्रिक देशों के शिखर सम्मेलन में न्योता न मिलने क्या मायने?

Sun, 28 Nov 2021 08:03 PM IST
अभिषेक दीक्षित वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो

सार

राष्ट्रपति बाइडन ने दक्षिण एशिया से भारत, पाकिस्तान, मालदीव और नेपाल को इस वर्चुअल शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया है। कुल 110 देशों के सरकार प्रमुखों के अलावा वहां के सिविल सोसायटी के संगठन और कारोबार जगत के प्रतिनिधि भी दो दिन के इस सम्मेलन में भाग लेंगे।
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की तरफ से आयोजित लोकतांत्रिक देशों के शिखर सम्मेलन (डेमोक्रेसी समिट) में श्रीलंका को क्यों नहीं बुलाया गया, इसको लेकर देश में कयास लगाए जा रहे हैँ। यहां के पर्यवेक्षकों का मानना है कि श्रीलंका में तय समय पर और स्वतंत्र रूप से चुनाव होते रहे हैं। चुनाव नतीजों के मुताबिक शांतिपूर्ण ढंग से सत्ता परिवर्तन हुआ है। इसके बावजूद उसे डेमोक्रेसी समिट में आमंत्रित नहीं किया गया, तो उसके पीछे भू-राजनीतिक कारण हैं।

विज्ञापन


राष्ट्रपति बाइडन ने दक्षिण एशिया से भारत, पाकिस्तान, मालदीव और नेपाल को इस वर्चुअल शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया है। कुल 110 देशों के सरकार प्रमुखों के अलावा वहां के सिविल सोसायटी के संगठन और कारोबार जगत के प्रतिनिधि भी दो दिन के इस सम्मेलन में भाग लेंगे। सम्मेलन में लोकतांत्रिक देशों के सामने मौजूद अवसरों के अलावा उन चुनौतियों और समस्याओं पर भी विचार होगा, जिनका सामना इन देशो को करना पड़ रहा है। अमेरिका को आशा है कि इस सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधि देश-विदेश में लोकतंत्र और मानव अधिकारों की रक्षा का संकल्प लेंगे।

जिन देशों को सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया है, उनमें चीन और रूस भी हैं। पर्यवेक्षकों का मानना है कि हाल के वर्षों में श्रीलंका ने जिस तरह चीन के साथ संबंध प्रगाढ़ किए हैं, उससे अमेरिका नाखुश है। इसी वजह से उसने डेमोक्रेसी समिट में श्रीलंका को आमंत्रित नहीं किया।
विज्ञापन


पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि जिस समय डेमोक्रेसी समिट में आमंत्रित देशों की सूची आई, लगभग उसी समय ये खबर भी आई कि श्रीलंका कोलंबो स्थित अपनी बंदरगाह परियोजना से जुड़े एक निर्माण का काम एक चीनी कंपनी को सौंपने जा रहा है। जबकि पहले इसका ठेका भारत और जापान की कंपनियों को साझा रूप से दिया गया था।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि ठेके देने के मामले में श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे संतुलन बनाने की कोशिश में जुटे रहे हैँ। इसीलिए कोलंबो बंदरगाह पर प्रस्तावित वेस्ट कंटेनर टर्मिनल को बनाने का ठेका भारत के अडानी ग्रुप को दिया गया है। ये ठेका 70 करोड़ डॉलर का है।

राजपक्षे ने कहा है कि श्रीलंका के भारत और चीन से संबंधों के मामले में उनका रुख ‘तटस्थ’ है। लेकिन इस हफ्ते उनकी सरकार ने कोलंबो बंदरगाह पर प्रस्तावित ईस्ट कंटेनर टर्मिनल के निर्माण का ठेका चीन की सरकारी कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग को देने का एलान किया। श्रीलंका सरकार ने कहा कि ये फैसला मंत्रिमंडल की तरफ नियुक्त एक समिति की सिफारिश के आधार पर किया गया है। जबकि मई 2019 में इस टर्मिनल के निर्माण के लिए श्रीलंका सरकार ने जापान और भारत के साथ सहमति पत्र पर दस्तखत किए थे। उस समय मैत्रिपाला सिरिसेना श्रीलंका के राष्ट्रपति थे।

वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम के एक विश्लेषण में कहा गया है कि ईस्ट कंटेनर टर्मिनल के बारे में हुए फैसले साफ हुआ है कि राजपक्षे सरकार का रुख चीन के पक्ष में झुका हुआ है। गोटबया राजपक्षे नवंबर 2019 में राष्ट्रपति बने। उसके बाद से श्रीलंका के रुख में लगातार बदलाव आया है। चीन ने अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव प्रोजेक्ट के तहत श्रीलंका में भारी निवेश किया है। इस वजह से राजपक्षे सरकार उसे तरजीह दे रही है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें