मंगलवार को यहां हुई क्वाड्रैंगुलर सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड) की शिखर बैठक को इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण समझा गया है कि इससे इस समूह में शामिल चारों देशों ने बेहिचक चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के अपने संकल्प का इजहार किया। बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा और ऑस्ट्रेलिया के नए प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने भाग लिया। क्वाड की बैठक से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने ताइवान के मामले में यह दो टूक कहा कि ताइवान पर चीनी हमले की स्थिति में उसकी रक्षा करने के लिए अमेरिका वचनबद्ध है। जानकारों के मुताबिक उनके इस बयान से क्वाड शिखर बैठक की पृष्ठभूमि तैयार हो गई।
जापान की अपनी इसी यात्रा के दौरान बाइडन ने इंडो-पैसिफिक इकॉनमिक फ्रेमवर्क (आईपीईएफ) नाम की नई आर्थिक पहल की शुरुआत की। क्वाड के चारों सदस्य देश इस नए समूह के संस्थापक सदस्य भी बने हैं। समझा जाता है कि क्वाड और आईपीईएफ के ठोस रूप लेने के साथ एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका ने फिर से अपनी पैठ बना ली है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपनी अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत इस क्षेत्र में अमेरिकी भूमिका घटा दी थी। अब जो बाइडन ने उसकी भरपाई करने की कोशिश की है।
लेकिन कुछ विश्लेषकों की राय है कि क्वाड की भूमिका अभी भी स्पष्ट नहीं है। यह तो साफ है कि यह सैनिक गठबंधन नहीं है। इसलिए यूरोप में जैसी भूमिका नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) की है, निकट भविष्य में एशिया प्रशांत क्षेत्र में क्वाड की वैसी भूमिका बनने की संभावना नहीं है।
इसीलिए एक समझ यह बनी है कि क्वाड और आईपीईएफ दोनों का मकसद समान विचार वाले देशों को ऐसा मंच प्रदान करना है, जहां से वे चीन को दो टूक संदेश दे सकें। सिओल स्थित एशिया इंस्टीट्यूट में सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ लखविंदर सिंह ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से बातचीत में कहा- ‘चीन ही वो पहलू है, जिसने हम सबको क्वाड की तरफ जाने को मजबूर किया है।’
कूटनीति विशेषज्ञों में इस बात पर आम राय है कि क्वाड का निशाना चीन है। टोक्यो में हुई शिखर बैठक में इस समूह ने चीन के प्रभाव रोकने का दो टूक इरादा जताया। इससे चीन को साफ संदेश मिला है। इस लिहाज से टोक्यो बैठक को एक सफल बैठक माना जा रहा है।