सुलेमानी लादेन या बगदादी की तरह छिपा नहीं था। कई देशों का दौरा करता था। ऐसे में उसे मारने के लिए ड्रोन हमले की जरूरत क्यों पड़ी? एक पूर्व अमेरिकी सैन्य कमांडर के मुताबिक सुलेमानी को लगता था कि उसे कोई छूने वाला नहीं।
वह अमेरिका को चिढ़ाते हुए इराक में बैटल ग्राउंड से सेल्फी पोस्ट करता था। वहीं, अमेरिका अपने तेल टैंकरों पर हमले के बाद ईरान को सख्त धमकियां देता रहा था लेकिन सेना के इस्तेमाल की बात नकार दी थी। ट्रंप ने पहले यह दिखाया कि वह युद्ध नहीं चाहते। हालांकि बदले हालत में ड्रोन हमले को मंजूरी दी।
इस ऑपरेशन की रणनीति किरकुक (इराक) में अमेरिकी ठेकेदार पर रॉकेट हमले के बाद बनना शुरू हुई। सैन्य विशेष ऑपरेशन कमांड ने सुलेमानी को निशाना बनाने की योजना बनाई। सैन्य और खुफिया अधिकारियों ने गुप्त सूचनाओं, इलेक्ट्रॉनिक इंटसेप्ट्स, टोही विमानों और अन्य सर्विलांस टूल्स के जरिए हमले का स्वरूप तय किया।
सुलेमानी के बगदाद हवाई अड्डे पर पहुंचने पर हमले का समय तय हुआ। हालांकि अगर उस दौरान उसके साथ इराकी अधिकारी होते तो हमला रोक दिया जाता। बृहस्पतिवार तक अमेरिकी सैन्य अधिकारी कम तीव्रता के हमले की तैयारी में थे, लेकिन ट्रंप ने बड़े हमले को मंजूरी दी। ट्रंप के सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट सीओ ब्रायन ने बताया कि राष्ट्रपति ने हमले पर स्पष्ट और तीव्र निर्णय लिया।
हमले को अमेरिकी कांग्रेस के एक्ट-2002 के तहत अंजाम दिया गया। इसके तहत अमेरिकी सेना को इराक में घुसने की इजाजत मिली थी। हमला इसलिए विशेष था क्योंकि सुलेमानी एक देश के शीर्ष अधिकारी थे। 1970 के बाद अमेरिका ने ऐसे लोगों की हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। हालांकि देश के लिए खतरा साबित होने वाले लोगों और आतंकवाद जैसे मामलों में ढिलाई दी गई थी, जिसका इस्तेमाल सुलेमानी ही हत्या में हुआ।