क्या पाकिस्तान का सऊदी अरब से मेलमिलाप हो गया है? अगर ऐसा हुआ, तो यह किन शर्तों या किन कारणों से हुआ? इन सवालों को लेकर पाकिस्तान में कयास लगाए जा रहे हैं। समझा जाता है कि पाकिस्तान सऊदी अरब को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहा है कि मुस्लिम दुनिया में सऊदी अरब के नेतृत्व को चुनौती देने का उसका कोई इरादा नहीं है। लेकिन ताजा घटनाक्रम के पीछे दूसरे कारण भी हैं।
दोनों देशों में मेलमिलाप होने का संकेत पिछले हफ्ते मिला, जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने मिस्र की यात्रा की। वहां उनकी मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी, वहां के विदेश मंत्री सामेह शौकरी और अरब लीग के महासचिव अहमद अबूल घेइत से बातचीत हुई। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बताया कि बातचीत आर्थिक मामलों पर हुई। लेकिन यहां के जानकारों की राय है कि कुरैशी की यात्रा का मकसद सऊदी अरब के खेमे वाले देशों के साथ संबंध सुधारना था। मिस्र को सऊदी खेमे का देश माना जाता है।
सिंगापुर स्थित एस राजारत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में सीनियर फेलॉ जेम्स एम दोरसे ने वेबसाइट निक्कई एशिया से कहा कि इस्लामी दुनिया में इस समय कई पहलुओं को लेकर सक्रियता है। पिछले साल अगस्त में जब पाकिस्तान और अरब लीग में टकराव पैदा हुआ था, तब सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने पाकिस्तान से तुरंत चार अरब डॉलर का कर्ज लौटाने को कहा।
फिर दिसंबर में यूएई ने पाकिस्तानी नागरिकों को वर्क वीजा देना बंद कर दिया। लेकिन पिछले हफ्ते कुरैशी की काहिरा यात्रा के बाद सूरत बदल गई है। सऊदी अरब और यूएई दोनों ने पाकिस्तान को एक-एक अरब डॉलर का कर्ज देने का एलान कर दिया है। इसके अलावा पाकिस्तान के बंदरगाह ग्वादार में सऊदी कंपनी अरामाको की रिफाइनरी लगाने की योजना के आगे बढ़ने के संकेत मिले हैं। ये रिफाइनरी दस अरब डॉलर की लागत से बनने वाली है।
जानकारों का कहना है कि सऊदी अरब और यूएई इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि पाकिस्तान पर दबाव बनाने की उनकी कोशिशों का ज्यादा असर नहीं हुआ। दोरसे ने कहा- ‘पाकिस्तान दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला मुस्लिम देश है। दुनिया की सबसे ज्यादा सुन्नी आबादी वहीं है। इसलिए खाड़ी देशों के लिए उसकी अनदेखी करना आसान नहीं है।’ दोरसे के मुताबिक जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद सऊदी अरब अपने प्रति अमेरिकी नीति को लेकर अनिश्चय में है। ऐसे में वह एक बड़े इस्लामी देश के साथ विवाद बढ़ाना नहीं चाहता। दोरसे के मुताबिक इस घटनाक्रम के पीछे इजराइल का पहलू भी है। सऊदी अरब इजराइल को मान्यता देना चाहता है। लेकिन ऐसा करने पर सबसे ज्यादा विरोध पाकिस्तान में होगा। इसलिए सऊदी अरब चाहता है कि उसके पहले पाकिस्तान इजराइल से राजनयिक संबंध बना ले।
लेकिन जानकारों का कहना है कि सऊदी खेमे से संबंध सुधरने के बावजूद पाकिस्तान का टर्की, ईरान, मलेशिया के गुट से संबंधों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यही तीनों देश मुस्लिम दुनिया में सऊदी अरब के नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं। विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान इन दोनों गुटों के बीच संतुलन बनाकर चलने और उनके टकराव का अधिकतम फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है।
वॉरसा वॉर स्टडीज एकेडमी में एशिया अनुसंधान केंद्र के विश्लेषक लुकास प्रजिबीसजेवस्की ने निक्कई एशिया से कहा- (पाकिस्तान के प्रधानमंत्री) इमरान खान और ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी ने मजबूत संबंध बना रखे हैं। सऊदी अरब और मिस्र के साथ आर्थिक मामलों में पाकिस्तान के हितों के जुड़ने का टर्की और ईरान के प्रति पाकिस्तान के रुख पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
वैसे अभी भी कई जानकार मानते हैं कि भले पाकिस्तान और सऊदी अरब के संबंध सुधर रहे हों, लेकिन इन संबंधों का पुराने दौर के स्तर पर जाना अब मुश्किल है। वॉशिंगटन स्थित संस्था विजियर कंसल्टिंग के अध्यक्ष आरिफ रफीक के मुताबिक तनाव घटने से पाकिस्तान में सऊदी अरब का निवेश फिर शुरू हो जाएगा। लेकिन सऊदी अरब कश्मीर मामले में पाकिस्तान का समर्थन करे, इसकी संभावना कम है। इसलिए पाकिस्तान के संबंध टर्की के साथ और मजबूत होंगे। पाकिस्तान ईरान के साथ व्यापार और सुरक्षा सहयोग को भी मजबूत बनाना जारी रखेगा।
फिलहाल, जानकार ताजा घटनाक्रम को पाकिस्तान के लिए लाभदायक मान रहे हैं। यह समझा जा रहा है कि जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने से बदले हालात का फायदा पाकिस्तान को मिल रहा है।