तीन दशकों में ऐसा पहली होगा, जब लंदन की आबादी घटेगी। ऐसा इसलिए होने जा रहा है क्योंकि कोरोना महामारी के कारण बड़ी संख्या में लोग इस पर फिर से विचार कर रहे हैं कि रहने के लिए सबसे मुफीद जगह कौन- सी है। एकाउंटेंसी फर्म प्राइसवाटर हाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) ने एक रिपोर्ट में ये बात कही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक इस साल लंदन की आबादी तीन लाख घटेगी। 2020 में इस महानगर की आबादी 90 लाख थी। 2021 के आखिर में यह 87 लाख रह जाएगी। गौरतलब है कि 1988 के बाद से यहां की आबादी हर साल लगातार बढ़ रही थी।
पीडब्ल्यूसी के मुताबिक कोरोना महामारी के दौरान लगाए गए लॉकडाउन में लोगों को मिला अनुभव यहां की आबादी में संभावित कमी का प्रमुख कारण है। लेकिन इसकी दूसरी वजहें भी हैं। मसलन, अब यहां आने वाले ग्रेजुएट्स की संख्या पहले से कम हो गई है। ऐसा यहां नौकरियों के अवसर घटने की वजह से हुआ है। ब्रेग्जिट का असर भी है कि अब यहां कम लोग आ रहे हैं।
दरअसल, 2016 के बाद से ब्रिटेन आने वाले विदशियों की संख्या में कमी आ रही है। 2021 में यह संख्या निगेटिव हो जाएगी। मतलब कि जितने लोग बाहर से ब्रिटेन आएंगे, उससे अधिक लोग यहां से बाहर जाएंगे। 1990 के दशक के आरंभिक वर्षों के बाद ऐसा पहली बार होगा।
पीडब्ल्यूसी ने कहा है कि पिछले साल अगस्त में लंदन की सिटी असेंबली की तरफ से कराए गए सर्वे से भी यही सामने आया था कि अब बड़ी संख्या में लोग इस शहर से जाना चाहते हैं। उस सर्वे में यहां के साढ़े चार फीसदी निवासियों ने कहा था कि अगले 12 महीनों में वे निश्चित रूप से यहां से चले जाएंगे। पीडब्लूसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल ब्रिटेन में जन्म दर में भी रिकॉर्ड गिरावट आने की संभावना है। इस साल जन्म दर सौ साल के (जब से जन्म दर का रिकॉर्ड रखने की शुरुआत हुई) न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाएगी।
सरकारी आंकड़ों से यह सामने आ चुका है कि ब्रिटेन में बेरोजगारी सबसे तेजी से लंदन और उसके आसपास के इलाकों में ही बढ़ रही है। यूरोपीय शहरों के बीच भी रोजगार के अवसर सबसे ज्यादा यहीं घटे हैं। अब जबकि ब्रिटेन तीन सौ वर्ष की सबसे गहरी मंदी का सामना कर रहा है, ये संकट और गहराने का अंदेशा है। महामारी का हॉस्पिटैलिटी, पर्यटन, रिटेल और यात्रा कारोबार पर बहुत बुरा असर पड़ा है। अतीत में लंदन इस सभी कारोबारों का प्रमुख केंद्र रहा है।
जानकारों ने कहा है कि जनसंख्या में कमी के साथ लंदन बीसवीं सदी के मध्य के दौर में पहुंच जाएगा। उस समय दूसरे विश्व युद्ध के कारण इस महानगर की आबादी तेजी से घटी थी। तब बड़ी संख्या में लोग यहां से बाहर चले गए थे। दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने से पहले 1939 में लंदन की आबादी 86 लाख थी। उसके बाद इसमें तेजी से गिरावट आई। 1980 में यह 68 लाख थी। 1980 के दशक में लंदन दुनिया के वित्तीय केंद्र के रूप में उभरा। उसके बाद यहां की आबादी तेजी से बढ़ी।
पीडब्ल्यूसी के अर्थशास्त्री हनाह औडिनो ने कहा है कि लंदन की आबादी में गिरावट का यहां की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर होगा। इससे यहां मकान की कीमत और परिवहन खर्च में गिरावट आएगी। उन्होंने कहा कि अभी यह कहना मुश्किल है कि गिरावट का ये दौर लंबे समय तक जारी रहेगा, या महामारी और ब्रेग्जिट का शुरुआती असर खत्म होने के बाद फिर से लंदन की चमक लौटने लगेगी।
लंदन के मेयर सादिक खान ने अखबार द गार्जियन से बातचीत में भरोसा जताया कि कोरोना संकट से निकलने के बाद लंदन और मजबूत होकर उभरेगा। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी का लंदन और यहां के निवासियों पर बहुत गहरा असर हुआ है। लेकिन इसके बाद शहर अधिक स्वच्छ, हरा और न्यायपूर्ण रूप में सामने आएगा। मगर जानकारों का कहना है कि ऐसे दावे सब भविष्य की बातें हैं। फिलहाल, कभी दुनिया भर के आकर्षण का केंद्र रहा ये महानगर अपने गिरावट के दौर में है।