पाकिस्तान में ज्यादातर पर्यवेक्षकों की राय है कि दलबदल कानून के बारे में सुप्रीम कोर्ट की अनुकूल व्याख्या भी अब शायद इमराम खान सरकार को नहीं बचा पाएगी। बलूचिस्तान अवामी पार्टी के बाद एक दूसरे सहयोगी दल- एमक्यूएम (पी) के भी सरकार से समर्थन खींच लिया है। इस कारण पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) पार्टी की जमीन और कमजोर हो गई है। एमक्यूएम (पी) ने अभी अपने रुख का दो टूक एलान नही किया है, लेकिन उसके इस बयान ने सबका ध्यान खींचा है कि वह विपक्षी दलों गठबंधन- पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) की राय का सम्मान करती है।
पीटीआई के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसके दो दर्जन सांसदों के पाला बदल लेने से पैदा हुई है। पीटीआई सरकार की अब कोशिश यह है कि इन सांसदों को अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान करने से रोक दिया जाए। इसके लिए इमरान खान सरकार ने प्रेसिंडेशियल रेफरेंस के तहत याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट से दलबदल से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 63-ए की व्याख्या करने की गुजारिश की है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए पांच सदस्यों की बेंच बनाई है, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस उमर अता बंदियाल करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने बताया है कि सरकारी याचिका पर गुरुवार को दोपहर एक बजे से सुनवाई होगी। अखबार डॉन में छपे एक विश्लेषण के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में फैसला देना है कि क्या सांसदों के ‘दलबदल की बेईमानी’ के कारण अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान करने से रोका जा सकता है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने एक याचिका दायर सुप्रीम कोर्ट से सभी संबंधित सरकारी अधिकारियों को संविधान एवं कानून के अनुरूप काम करने का निर्देश देने की गुजारिश की है। इस याचिका पर भी जस्टिस बंदियाल की अध्यक्षता में बनी बेंच ही सुनवाई करेगी।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया कि सांसदों के पाला बदलने के अनुमान के आधार पर स्पीकर उनकी सदस्यता खारिज कर सकते हैं, तो इमरान खान सरकार के बचने की एक हल्की उम्मीद पैदा हो सकती है। लेकिन अगर उसने यह फैसला दिया कि मतदान के दौरान पाला बदलने की पुष्टि होने के बाद ही उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है, तो पीटीआई सरकार का गिरना तय हो जाएगा।