अमेरिका में मुद्रास्फीति की दर 40 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है। चूंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में जो होता है, उससे सारी दुनिया प्रभावित होती है, इसलिए अमेरिका की महंगाई की चर्चा हर जगह पर है। लेकिन महंगाई की मार सिर्फ अमेरिकावासियों पर ही नहीं पड़ रही है। यह असल में इस वक्त सारी दुनिया की कहानी है।
ड्यूश बैंक के मुताबिक 111 देशों की मुद्रास्फीति दर का अगर औसत निकाला जाए, तो यह 7.9 फीसदी बैठता है। साल भर पहले ये औसत दर तीन फीसदी थी। मई में पश्चिम यूरोप के देशों में महंगाई तेजी से बढ़ी। नीदरलैंड्स में ये दर साल भर पहले की तुलना में 8.8 फीसदी और जर्मनी में 7.9 फीसदी हो गई। फ्रांस में स्थिति कुछ बेहतर (5.8 प्रतिशत) रही, लेकिन बाल्टिक देशों में तो यह लगभग 20 फीसदी के करीब पहुंच गई।
अमेरिका के लेबर ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक वहां महंगाई का प्रमुख कारण ईंधन का महंगा होना है। अमेरिका में साल भर पहले की तुलना में ऊर्जा आज 35 फीसदी महंगी है। लेकिन ब्रिटेन में ऊर्जा महंगाई की दर 51 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।
इस बीच एक अजूबा देश तुर्किये है। वहां मई में मुद्रास्फीति दर 74 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर रही। इसके बावजूद वहां के राष्ट्रपति रजिब तैयिब एर्दोआन ने ब्याज दर में कटौती की नीति पर चलने का एलान किया है। तुर्किये के बाद महंगाई की सबसे ऊंची दर अर्जेंटीना में है, जहां यह 58 फीसदी पर है। लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के ज्यादातर देशों में इस समय मुद्रास्फीति दर दो अंकों में है।
अब जानकारों की नजर अनाज और ईंधन के विश्व बाजार पर है। उनमें आम सहमति है कि जब तक इन चीजों के दाम नहीं घटते, दुनिया को महंगाई के मौजूदा दौर से निज़ात नहीं मिल सकेगी।