न्यूयार्क आधारित मानवाधिकार समूह ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की एशिया मामलों की निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, जो हजारों लोग एक साल पहले शेख हसीना की दमनकारी सत्ता के खिलाफ हिंसा की आशंका के बावजूद सड़कों पर उतरे थे, उनकी उम्मीदें अब भी अधूरी हैं। समूह ने कहा, अंतरिम सरकार अपनी मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में नाकाम रही है।
न चुनाव प्रक्रिया पर काम, न धार्मिक हमले कम हुए
यूनुस सरकार ने 11 सुधार आयोग बनाए हैं, जिनमें एक राष्ट्रीय सहमति आयोग भी शामिल है जो प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ चुनाव प्रक्रिया पर काम कर रहा है। लेकिन अब तक चुनाव की समयसीमा और प्रक्रिया पर सहमति नहीं बन सकी है। महिलाओं व अल्पसंख्यकों पर धार्मिक चरमपंथी हमले बढ़े हैं। हालांकि, मानवाधिकार समूहों का कहना है कि जबरन गायब करने जैसी कुछ ज्यादतियां रुकी हैं, लेकिन अब मनमाने ढंग से हिरासत में लिए जाने के आरोप सामने आ रहे हैं।
राजनीति बांटने वाली ताकतें उभरीं
ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा, देश में राजनीतिक अस्थिरता का दौर अब भी जारी है। पूर्व पीएम खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने दिसंबर या फरवरी में चुनाव की मांग की है, जबकि यूनुस सरकार अप्रैल में चुनाव की बात कह रही है। प्रतिबंधित इस्लामी दलों को यूनुस सरकार में उभरने का मौका मिला। जमात-ए-इस्लामी भी बढ़ा, जिससे आशंका है कि कट्टरपंथी ताकतें देश की राजनीति को बांट सकती हैं।
असली आजादी अब तक नहीं
राजनीतिक विश्लेषक नजमुल अहसान कालिमुल्लाह ने कहा, इस्लामी ताकतों का उभार दिखाता है कि भविष्य में बांग्लादेश में कट्टरता की जड़ें गहराई तक जा सकती हैं। उन्होंने कहा, यूनुस सरकार से लोगों की उम्मीद थी कि वह चुनावी प्रक्रिया में सुधार को प्राथमिकता देगी, लेकिन वह अवसर चूकती नजर आ रही है। आंदोलन के वक्त अपनी खिड़की से फोन पर बात करते हुए एक गोली का शिकार बनीं मेहरुन्निसा के पिता मोशर्रफ हुसैन ने कहा, यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन का आंदोलन नहीं था, बल्कि यह गहरी निराशा की अभिव्यक्ति था। 54 वर्षों बाद भी हमें असली आजादी नहीं मिली है।