जी-7 देशों में वैश्विक न्यूनतम कॉरपोरेट टैक्स को लेकर बनी सहमति के लागू होने के रास्ते में मुख्य बाधा यूरोपीय देश हैं। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि यूरोपीय देशों की नीति लंबे समय से उदार टैक्स दरों के जरिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने यहां आकर्षित करने की रही है। ये देश अब तुरंत अपनी ये नीति बदलने को तैयार हो जाएंगे, ये संभव नहीं दिखता। इस सप्ताहांत जी-7 देशों का शिखर सम्मेलन ब्रिटेन में हो रहा है। इसमें भाग लेने के लिए जो बाइडन बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति पहली बार विदेश यात्रा पर निकले हैं।
पिछले हफ्ते जी-7 वित्त मंत्रियों की बैठक में न्यूनतम टैक्स लागू करने पर सहमति बनी थी। उसका ब्रिटेन के अलावा जर्मनी और फ्रांस ने पुरजोर समर्थन किया। ये यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश हैं। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि न्यूनतम ग्लोबल टैक्स दर का सबसे ज्यादा विरोध आयरलैंड, लक्जमबर्ग और साइप्रस जैसे देश करेंगे। इन देशों ने गूगल, फेसबुक आदि जैसी कंपनियों को लुभाने की होड़ रही है। इसके लिए उन्होंने अपने यहां कॉरपोरेट टैक्स की दरें कम से कम कर रखी हैं।
वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू ने यूरोपियन यूनियन (ईयू) के सदस्य लगभग दर्जन भर देशों के राजनयिकों से बातचीत के बाद तैयार अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जिन देशों की नीति टैक्स दरों को कम रखने की रही है, वे बिना संघर्ष के धनी देशों के न्यूनतम ग्लोबल टैक्स दर के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे। हंगरी में कॉरपोरेट टैक्स दर 9 फीसदी है। अब वह इसे बढ़ा कर 15 फीसदी करने के जी-7 के प्रस्ताव को लेकर आशंकित है। उसे आपत्ति इस बात से भी है कि ये प्रस्ताव तैयार करते वक्त बाकी देशों से राय-मशविरा नहीं किया गया।
हंगरी जैसे देशों का तर्क है कि टैक्स दर संबंधी प्रस्ताव पर पहले धनी देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन फॉर इकॉनमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) के मंच पर चर्चा होनी चाहिए थी। कई देशों के राजनयिकों ने वेबसाइट पॉलिटिको से कहा कि जी-7 के प्रस्ताव पर अभी पूरे यूरोप में कोई सहमति नहीं है। अगर जुलाई में होने वाली जी-20 की बैठक में भी इस मामले मे सहमति बन जाती है, तब भी यूरोप में सभी देशों को इस पर राजी करने में कई साल लग सकते हैँ।
कुछ देशों की सरकारों ने तो खुल कर इस प्रस्ताव की आलोचना की है। आयरलैंड के वित्त मंत्री पास्कल दोनोहो ने ट्विटर पर लिखा- ‘इस वार्ता में 139 देश पक्ष हैं। कोई भी समझौता छोटे और बड़े, विकसित और विकासशील सभी देशों की जरूरतों को पूरा करते हुए ही हो सकता है।’ जी-7 देशों के वित्त मंत्रियों में इस मुद्दे पर सहमति बनने के बाद अमेरिका की वित्त मंत्री जेनेट येलेन ने कहा था कि उनकी राय इस से ये संकेत मिलता है कि बहुपक्षीय सहमति से काम करने का दौर वापस आ गया है। अब जी-7 और जी-20 देश वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद अति महत्त्वपूर्ण मसलों का हल ढूंढने में सहयोग कर रहे हैं। लेकिन आयरलैंड जैसे देशों ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की, उससे संकेत मिला कि धनी देशों ने सभी देशों का सहयोग पाने की कोशिश नहीं की है।
ईयू के भीतर टैक्स नीति तय करना सभी 27 देशों की सरकार के अपने अधिकार क्षेत्र में आता है। आयरलैंड, साइप्रस और हंगरी जैसे देशों ने कम टैक्स दर रख कर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने यहां आकर्षित किया है। उन्हें अंदेशा है कि अगर सभी जगह समान दर से टैक्स लगने लगेगा, तो वे कंपनियां बड़े बाजार वाले देशों में अपना मुख्यालय बनाना पसंद करेंगी। वेबसाइट पॉलिटिको के मुताबिक कुछ और देश हैं, जो संदेह की निगाह से इस प्रयास को देख रहे हैं। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया इसलिए नहीं दी है, क्योंकि ग्लोबल न्यूनतम टैक्स के प्रस्ताव की पूरी बारीकियां अभी सामने नहीं आई हैं।