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क्या सोशल मीडिया के जरिए होगी आधुनिक क्रांति?

Sun, 11 Nov 2012 01:27 AM IST
सॉन कूगलान, शिक्षा संवाददाता, बीबीसी
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क्या दुनिया की अगली क्रांति फेसबुक, ट्वीटर और मोबाइल फोन पर लिखी जाएगी? इस बात में कितना दम है इसके बारे में कुछ ठोस नहीं कहा जा सकता लेकिन इनदिनों इस पर चर्चा खूब हो रही है। अरब देशों में हुई क्रांति में इन साइट्स के इस्तेमाल को मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है। माना जाता है कि अरब देशों में दमनकारी सत्ता के विरोध में लोगों को एकजुट करने में सोशल मीडिया की भूमिका काफी अहम थी।
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लिहाजा अब लोगों को क्रांति का नया पाठ पढाने के लिए इटली में एक केंद्र खोला गया है जहां छात्रों को इन वेबसाइट्स का इस्तेमाल क्रांति के लिए कैसे किया जाए ये सिखाया जाएगा। दुनिया भर के छात्रों को मानवाधिकार की लड़ाई के लिए ऑनलाइन तकनीक सिखाने के लिए इटली के फ्लोरेंस में एक अंतराष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र खोला गया है।

फ्लोरेंस में प्रशिक्षण केंद्र खोलने वाली अमेरिकी संस्थान रॉबर्ट केनेडी मानवाधिकार और न्यायिक केंद्र का कहना है ये केंद्र लोगों को मानवाधिकार की लड़ाई के लिए ऑनलाइन तौर तरीकों के व्यवहारिक और शैक्षणिक पहलुओं की जानकारी देगी।
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मानवाधिकार के ऑनलाइन तरीके
फ्लोरेंस में ये केंद्र एक पुराने जेल में खोला गया है जिसे फ्लोरेंस शहर की तरफ से केंद्र को दान में दिया गया है। केंद्र के प्रमुख फेडरिको मोरो का कहना है कि इस संस्थान का मूल उद्देश्य तकनीक के जरिए जनतांत्रिक और न्यायिक व्यवस्था कायम करना है।

मोरो कहते हैं कि सोशल मीडिया के जरिए समाज में बड़े बदलाव संभव हैं। मोरो कहते हैं, “क्रांतिकारियों के पास जूनून होता है विश्वास होता है लेकिन इनको व्यवहारिक जानकारी की भी जरूरत होती है। बदलाव के लिए जरूरी है आापके भीतर कौशल का होना।” रॉबर्ट केनेडी संस्थान छात्रों को स्कॉलरशिप देकर इस पढा़ई के लिए मदद करेगी। वैसे छात्र जो ब्लॉग लिखते हों और क्रांतिकारी हों उन्हें नामांकन में प्राथमिकता दी जाएगी। अपने किस्म का एक ये अलग केंद्र है जहां ऑनलाइन क्रांति का पाठ पढ़ाया जाएगा।

लेकिन ब्रुकलैंड के मानवाधिकार समूह के कार्यकर्ता क्रिश माइकल ऑनलाइन क्रांति को सिरे से खारिज करते हैं। माइकल का कहना है कि सोशल मीडिया के जरिए क्या तानाशाही खत्म की जा सकती है। क्या यू ट्यूब और ट्वीटर के माध्यम से हिटलर और स्तालिन सरीखे लोगों की पोल खोली जा सकती है।

मोबाइल और फेसबुक से आएगी क्रांति
क्या वाकई आधुनिक क्रांति मोबाइल फोन के स्क्रीन और आई-फोन से बाहर निकलेगी। लेकिन ये सब इतना आसान नहीं है। उनका कहना है कि आप अपनी बातों और जज्बातों को कहीं पर लिख सकते हैं, छाप सकते हैं, दिखा सकते हैं तो इसका ये मतलब नहीं है कि आप बदलाव समाज में बदलाव भी ला सकते हैं।

जबकि जॉर्डन के एक कार्यकर्ता और पत्रकार राना हुसैनी, माइकल से अलग राय रखती हैं। सम्मान के लिए हत्या मसले पर काफी काम कर रही हुसैनी कहते हैं कि इंटरनेट ने आम लोगों को अपनी आवाज बुलंद करने का मंच दिया है। आम लोगों को विरोध दर्ज करने के लिए पहले जहां सड़कों पर उतरना जरूरी होता था वहीं अब कुछ लोग फेसबुक और ट्वीटर के जरिए अलख जगा लेते हैं।

अरब देशों में दमनकारी सत्ता के विरोध के लिए लोगों ने इन वेबसाइट्स का जमकर इस्तेमाल किया इसमें भी कोई दो राय नहीं है कई जगहों पर फेसबुक और ट्वीटर के जरिए क्रांति का आगाज भी हुआ और अंदाज सड़कों पर दिखा। अगर ये कहा जाए कि ‘स्ट्रीट प्रोटेस्ट’ अब ‘ट्वीट प्रोटेस्ट’ में बदल रहा है तो इसमें कोई दो राय नहीं होगी। लेकिन सच भी यही है कि असली क्रांति सड़क पर ही होती है। ऐसे में फ्लोरेंस में खुले संस्थान की भूमिका कितनी अहम होगी ये जानना काफी दिलचस्प होगा।
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