आखिकार लंबी जद्दोजहद के बाद साफ हो गया कि ब्रिटेन अब यूरोपीय यूनियन का हिस्सा नहीं रहेगा। जनमत संग्रह में 52 फीसदी लोगों ने ‘ब्रेग्जिट’ के पक्ष में मतदान किया, वहीं 48 फीसदी वोट ‘रीमेन’ के पक्ष में पड़े।
ब्रिटिश पीएम कैमरन ने उम्मीद जताई कि ईयू से अलग होने के फैसले से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में सुधार होगा। हालांकि ब्रिटेन के ईयू से अलग होने की प्रक्रिया में पूरे दो साल लग जाएंगे। ब्रिटिश मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन ने इस जनमत संग्रह के जरिए 43 साल बाद ईयू की सदस्यता छोड़ने का निर्णय लिया।
लेकिन सबसे अहम सवाल ये है कि ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से अलग होने पर भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत पर असर
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रुपया
ब्रिटेन के परिणाम आते ही 60 पैसे लुढ़क कर डॉलर के मुकाबले 68.85 पर पहुंचा रुपया। आरबीआई ने दखल दिया, तब सुधरा। रुपया और गिरा तो भारत के लिए कच्चा तेल खरीदना महंगा हो जाएगा।
इंडस्ट्री
ब्रिटेन में 800 भारतीय कंपनियां हैं। ब्रिटेन से ईयू से बाहर होने पर इन कंपनियों के कारोबार पर असर होगा, क्योंकि ज्यादातर यूरोप के खुले बाजार में बिजनेस कर रही है। 1.1 लाख लोगों को रोजगार देने वाली इन कंपनियों को ईयू और ब्रिटेन को अलग-अलग टैक्स देना होगा। टाटा मोटर्स, एयरटेल और कई फार्मा कंपनियों की चुनौती बढ़ सकती है।
नौकरी
भारत के अलग-अलग हिस्सों से लोग यूरोप में नौकरी के लिए जाते हैं। आंकड़ों के मुतबिक, ब्रिटेन में 20 हजार गोवा के लोग पुर्तगाल के पासपोर्ट पर काम कर रहे हैं। ईयू से अलग होने के बाद इन लोगों के लिए वहां काम करना मुश्किल हो जाएगा। पुड्डुचेरी के लोगों के पास भी पुर्तगाल का पासपोर्ट है, वह भी मुश्किल में आएंगे। पंजाब के लोगों की चुनौती भी बढ़ेगी।
शिक्षा
ईयू से समझौतों के कारण ब्रिटेन के स्कूल, कॉलेजों में अभी तक यूरोपीय छात्रों को छात्रवृत्ति और दाखिले में प्राथमिकता दी जाती है। अब ऐसा नहीं होगा। इससे भारतीय छात्रों के लिए ब्रिटेन में पढ़ाई के अवसर बढ़ेंगे।
क्या है यूरोपियन यूनियन?
ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन
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यूरोपियन यूनियन 28 देशों का महासंघ है, जिसकी संसद में यूरोप के सभी देश अपने चुने हुए सदस्यों को भेजते हैं। इसकी कार्यपालिका में यूरोपियन कमीशन का एक अध्यक्ष होता है, और एक कैबिनेट भी, जिसमें सदस्य देशों के प्रतिनिधि होते हैं।
ब्रिटेन वर्ष 1973 से यूरोपियन यूनियन का हिस्सा है, लेकिन इसके बावजूद वह शेष यूरोप से हमेशा आशंकित ही रहा है, जहां बाकी यूरोपीय देशों ने शेनजेन एग्रीमेंट के बाद अपनी सीमाओं से आना-जाना काफी आसान कर दिया, वहीं ब्रिटेन इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
इसके अलावा बाकी यूरोपीय देशों ने एक ही मुद्रा ‘यूरो’ को अपना लिया, जबकि ब्रिटेन इससे भी बाहर रहा। वह यूरो के लिए अपनी मुद्रा पाउंड स्टर्लिंग को छोड़ने के लिए कभी राजी नहीं हुआ।
जिन देशों ने यूरो को अपनाया उनकी इमिग्रेशन पॉलिसी भी एक जैसी तय हुई। रक्षा, आर्थिक क्षेत्र और विदेश नीति पर भी एक राय में फैसले लिए जाने लगे। एक वीजा से पूरे यूरोपीय यूनियन में एंट्री हो सकती है।