लंदन में क्रिसमस के अलावा बाक़ी सारे त्यौहार, बर्थडे और अक्सर अंतिम संस्कार तक वीकेंड पर होते हैं क्योंकि सोमवार से शुक्रवार तक ज़्यादातर लोगों की ज़िंदगी रेहन पर होती है।
लंदन में अभी मौसम अमूमन वैसा ही है, जैसा भारत में फागुन में होता है, अबीर-गुलाल से पुते चेहरों में काले-भूरे कम और गोरे-गुलाबी मुखड़े ज़्यादा हैं।
इस इवेंट की रंग-बिरंगी तस्वीरें अख़बारों में छप रही हैं, जिनमें कहा जा रहा है कि 'हिंदू फेस्टिवल' से 'इन्सपायर' होकर लंदन के बैटरसी पार्क में रंगों का त्यौहार मनाया जा रहा है जिसके टिकट पूरी तरह 'सोल्ड आउट' हैं, सोलह पाउंड यानी तकरीबन डेढ़ हज़ार रुपए का एक टिकट।
लंदन के अख़बारों ने लिखा है कि 'हिंदू फेस्टविल की गुडविल स्पिरिट को रिक्रिएट' करने की कोशिश की गई है, जबकि भारत में 'बुरा न मानो, होली है' का नारा इसीलिए बुलंद किया जाता है कि दूसरों को बुरा महसूस कराने में कोई कसर छोड़ी नहीं जाती।
'इंडियन कलर्स, इंडियन फ्लेवर्स और इंडियन एनर्जी' से सराबोर इस उत्सव में मेरे जैसे लोगों के लिए कुछ नया नहीं है क्योंकि होली, दशहरा, दीपावली और बैसाखी के नाम पर भांगड़ा और डांडिया (पंजाबी और गुजरातियों के रसूख और उनकी संख्या के अनुपात में) लंदन के सबसे मशहूर चौराहे ट्रैफ़लगर एस्क्वेयर पर कभी एक महीना पहले या तो कभी एक महीना बाद, सहूलियत के हिसाब से, लेकिन होते ज़रूर हैं।
भारतीयों का आत्मविश्वास
मैं लंदन में पिछले 16 साल से रह रहा हूँ, ये सब कुछेक साल पहले ही शुरू हुआ है, इससे पहले भी लंदन में भारतीय मूल के हज़ारों लोग रहते थे जो हरीश से हैरी, गिरीश से गैरी, जगमीत से जैग और मोहम्मद से मो हो जाने में ही भला समझते थे।
दीपावली के पटाखे जो अब सुपरस्टोर्स में मिलते हैं उनके बारे में कोई देसी सोचने से घबराता था क्योंकि उनकी आवाज़ से अँगरेज़ों के कुत्तों के हड़कने होने की आशंका रहती थी, पिछले तीन साल से मेरा नौ साल का बेटा रात में गोरों के मोहल्ले में दीवाली वाले वीकेंड पर दनादन रॉकेट दाग़ता है।
ये मामूली आत्मविश्वास नहीं है, ये आत्मविश्वास पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश या पूर्वी यूरोप से आए लोगों में नहीं दिखता। अबीर-गुलाल लगाकर गोरों का शान से पागल दिखना तो दूर की बात है, देसी लोग अपनी राखी फुलस्लीव शर्ट के नीचे छिपाते थे। अब ऐसा क्या हो गया कि अगस्त में क्लिक करें ब्रिटेन में लंदनवाले टिकट ख़रीदकर होली मनाने लगे?
यह इंडिया की 'सॉफ्ट पावर' है, सॉफ्ट पावर उसी की होती है जिसके पास 'हार्ड कैश' होता है, जिसके पास ग्रोथ रेट होता है। जिससे उम्मीदें होती हैं, आप उसी को बूझना और उसी पर रीझना चाहते हैं। इन सबके साथ-साथ लंदन में भारतीयों के पास संख्याबल भी है।
मैं राँची में पैदा हुआ, मेरे पिता जी भी, लेकिन हमारे घर में आज भी भोजपुरी बोली जाती है, झारखंड की कोई भाषा या बोली नहीं। सरहुल या करमा नहीं मनाया जाता। कोई पराजित, शोषित लोगों की संस्कृति अपनाना नहीं चाहता।
पैसे का नशा
संस्कृति का सत्ता से सीधा रिश्ता होता है, पूंजी के दौर में सत्ता बाज़ार के पास है और एक बहुत बड़ा बाज़ार भारत में है। जब भारत के कपास, चाय और मसालों की ज़रूरत थी, जब चंपा के जंगल उजाड़कर चंपारण में नील उगाना था तो अँगरेज़ 'देयर वाज़ ए कोल्ड डे' की तर्ज़ पर 'दरवाज़ा खोल दे' बोलने की प्रैक्टिस करते थे।
एक बार फिर जब भारत में माल बेचना है तो बॉलीवुड के तराने सुहाने लगने लगे हैं।
अँगरेज़ी सीखने में हमें भी ज्यादा वक़्त नहीं लगा, अगर शासक डच, पुर्तगाली या फ्रेंच होते तो हम उनकी भाषा यूँ ही सीख जाते, मेरे पुरखे आसानी से फ़ारसी सीख गए थे, उससे पहले संस्कृत भी कठिन नहीं लगती थी।
यूरोपीय और अमेरिकी लोगों का भारत-प्रेम कोई नया नहीं है जिसकी जड़ें ज्योतिष से लेकर कामसूत्र और दर्शन से लेकर भोजन तक में होती हैं, मगर ये लोग गिनती के रहे हैं जिन्हें 'इंडोफ़ाइल' कहा जाता है, मैं अहमक हूँ कि मुझे ये शब्द 'पीडोफ़ाइल' की याद दिलाता है।
लंदन में जो रंग दिख रहा है वो दुनिया में बदलाव का रंग है, ये उस सपने का रंग है जो भारत के करोड़ों मध्यवर्गीय उपभोक्ता जापान-कोरिया से लेकर अमेरिका तक को दिखा रहे हैं।
ये 'इंडियन मिस्टिसिज्म' यानी भारतीय रहस्यवाद का रंग नहीं है जिसे सिर्फ़ मैक्स मूलर, रोम्या रोला या ग्रियर्सन जैसे लोग समझते थे, ये मुद्रा की महक और नकदी का नशा है जो ज़्यादातर लोगों पर चढ़ता है।
राजेश प्रियदर्शी/बीबीसी संवाददाता, साउथॉल से