लैब में बनाया गया दुनिया का पहला बर्गर पेश कर दिया गया है। लंदन में सोमवार को एक संवाददाता सम्मेलन में इस बर्गर को दुनिया के सामने न केवल रखा गया बल्कि खाकर भी दिखाया गया।
इसके लिए वैज्ञानिकों ने नीदरलैंड के एक संस्थान में गाय की कोशिकाओं को मांसपेशियों में बदल दिया। इसी को मिलाकर खाने की ये चीज़ तैयार की गई है।
अध्ययन से जु़ड़े लोगों का कहना है कि मांस की बढ़ती हुई मांग की ज़रूरत को पूरा करने के लिए यह लंबे समय तक कारगर होने वाला तरीका हो सकता है।
हालांकि आलोचक कहते हैं कि मांस का कम सेवन करना खाने की चीजों की संभावित कमी से निपटने का बेहतर तरीका हो सकता है। इस योजना को गुप्त रूप से समर्थन करने वालों में गूगल के सहसंस्थापक सर्जेई ब्रिन शामिल हैं।
कैसा है ज़ायका
ये बर्गर शेफ़ रिचर्ड मैकगोवान ने तैयार किया और फ़ूड क्रिटिक हानी रुइटज़लर और जोश श्कोनवर्लड ने इसे चखकर देखा।
चखने के बाद हानी रुइटज़लर ने कहा, "मैं थोड़ी मुलायम पर्त की उम्मीद कर रही थी। ये मांस जैसा है लेकिन उतना रसीला नहीं है। नमक और काली मिर्च की कमी महसूस कर रही हूँ।"
वहीं जोश श्कोनवर्लड का कहना था, "मुंह में जाकर ये मांस जैसा लगता है। लेकिन उसमें जो चर्बी होती है वो नहीं है।"
बीबीसी न्यूज़ को बर्गर बनाने वाली प्रयोगशाला में जाने की विशेष इजाज़त दी गई। इसी प्रयोगशाला में 2,15,000 पाउंड या दो करोड़ से भी ज़्यादा की परियोजना लागत से कृत्रिम मांस तैयार किया गया है।
बर्गर परियोजना पर काम करने वाले मासट्रिक्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्क पोस्ट कहते हैं, "हम ये इसलिए कर रहे हैं क्योंकि पालतू जानवरों को पालना पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं है। यह दुनिया की ज़रूरत भी पूरी नहीं करने जा रहा है और यह जानवरों के लिए भी अच्छा नहीं है।"
लेकिन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में फूड पॉलिसी रिसर्च नेटवर्क की प्रमुख प्रोफेसर तारा गार्नेट कहती हैं कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल लोगों को तकनीकी रास्तों के अलावा भी दूसरे विकल्पों की ओर देखना चाहिए।
मोटापा और भूख
रोफेसर तारा गार्नेट कहती हैं, "हम ऐसे हालात का सामना कर रहे हैं जहां एक तरफ 1.4 अरब लोग अधिक वज़न और मोटापे से जूझ रहे हैं और वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर में एक अरब लोग भूखे सोने जाते हैं। यह बहुत अजीब और अस्वीकार्य है। समस्या का समाधान यह नहीं है कि खाने की चीज़ो का ज्यादा उत्पादन किया जाए। इसके बजाय आपूर्ति के तौर तरीके को बदले जाने की ज़रूरत है। इसके अलावा खाने पीने की चीजें खरीदने की लोगों की क्षमता भी अहम है। इसलिए सवाल केवल खाने पीने की चीजों की अधिक ज़रूरत का ही नहीं है बल्कि ज़रूरतमंद लोगों को बेहतर गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थ मिलने का भी है।"
वैज्ञानिकों ने लैब में जो मांस बनाया है, वह शुरुआत में सफेद रंग का होता है। प्रोफेसर पोस्ट के साथ काम कर रहे हेलेन ब्रीउड ने लैब में बनाए गए मांस को मायोग्लोबिन के ज़रिए लाल रंग का बनाने की कोशिश की है।
हेलेन ब्रीउड कहती हैं, "अगर यह दिखने और खाने में सामान्य मांस के जैसा नहीं हुआ और यह है भी नहीं तो इसे एक बेहतर विकल्प के तौर पर नहीं अपानाया जा रहा है।"
हालांकि अभी इस परियोजना पर काम जारी है। सोमवार को दुनिया के सामने पेश किए गए बर्गर को चुकंदर के रस के जरिए लाल रंग का बनाया गया था। लैब में बर्गर बनाने वाली टीम ने इसके जायके में इजाफे के लिए इसमें ब्रेड का टुकड़ा, भुनी हुई शक्कर और केसर भी मिलाया है।
बीबीसी संवाददाता पल्लब घोष की रिपोर्ट