उत्तर बिहार के सबसे बड़े शहर मुजफ्फरपुर से सवारी गाड़ी जब हाजीपुर की दिशा में चलती है तो रास्ते में एक स्टेशन आता है– तुर्की। पता नहीं इस तुर्की का टर्की और तुर्किस्तान कहे जाने वाले देश तुर्की से कोई रिश्ता है कि नहीं।
मगर ब्रिटेन और भारत के नक्शे पर बसे दोनों पटना के बीच एक रिश्ता है। हालांकि हो सकता है, ब्रिटेन के पटना को देखने के लिए नक्शे को और बारीकी से देखना पड़े, क्योंकि ब्रिटेन का पटना बहुत छोटा है, ये एक गांव है- पटना विलेज।
ये पटना है ब्रिटेन के प्रांत स्कॉटलैंड में, वहां के सबसे बड़े शहर ग्लास्गो के पास, ईस्ट एयरशायर काउंसिल में– लंदन से साढ़े छह सौ किलोमीटर दूर, बिहार की राजधानी पटना से 10 हजा किलोमीटर दूर। छोटा सा गांव है, दो-चार रास्ते हैं, जो शुरू होने के थोड़ी ही दूर पर खत्म हो जाते हैं। भीड़-भड़क्का बिल्कुल नहीं, हालांकि आबादी दो-ढाई हजार से लेकर तीन-साढ़े तीन हजार के आस-पास बताई जाती है।
गांव में एक नदी है- दून नदी। गांव नदी के एक तट पर नहीं, दोनों तटों पर बसा है। नदी गांव से होकर जाती है। दो पुल हैं, नया और पुराना। पुराना 1805 में बना, नया 1960 में। दून नदी गांव की एक बड़ी पहचान है। स्कॉटलैंड के सबसे बड़े कवि रॉबर्ट बर्न्स ने इसी नदी को केंद्र में रखकर 220 साल पहले एक लोकगीत लिखा था जो आज भी लोकप्रिय है।
इतिहास
पटना गांव का नाम पटना रखा जाना एक संयोग नहीं, इसके पीछे एक इतिहास है। इसकी शुरुआत होती है 1745 से जब यहां के एक व्यवसायी विलियम फुलर्टन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ बिहार गए जो तब बंगाल हुआ करता था। वो वहां से चावल ब्रिटेन भेजा करते थे।
बाद में उनके भाई जॉन फुलर्टन भी वहां गए जो ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में मेजर जनरल थे और पटना में तैनात थे। वहीं 1774 में उनके बेटे का जन्म हुआ। उसका भी नाम था– विलियम फ़ुलर्टन। जॉन फ़ुलर्टन ने भारत में अंतिम सांसें लीं। फ़ुलर्टन परिवार स्कॉटलैंट लौट आया जो तब तक संपन्न हो गया था, एक जमींदार परिवार बन चुका था।
विलियम ने खदानों के कारोबार में हाथ डाला। इस इलाके में कोयला और चूना प्रचुर मात्रा में मौजूद था। इसी विलियम ने 1802 में एक गांव बसाया, मुख्य रूप से कोयला खदान में काम करने वाले लोगों को ध्यान में रखकर, और इस गांव का नाम उसने अपनी जन्मस्थली के नाम पर रखा– पटना।
ग्लास्गो में पुलिस सुपरिंटेंडेंट रह चुके डोनल्ड रीड स्थानीय इतिहास के जानकार हैं। उन्होंने पटना के बारे में एक किताब में एक अध्याय लिखा है। डोनल्ड कहते हैं, "शायद बिहार के लोगों को स्कॉटलैंड के पटना की उतनी जानकारी न हो, पर यहां अधिकतर लोगों को इस पटना और बिहार के उस पटना के संबंध के बारे में पता है।”
दिलचस्पी
पटना गांव में लोग तारीख-इतिहास को जानें या न जानें, ये अवश्य जानते हैं कि दूर भारत में एक पटना है। पटना प्राइमरी स्कूल के बच्चों को उनके गांव के इतिहास के बारे में बताया जाता है। स्कूल की एक बच्ची एलीना ने बताया, "वहां एक बड़ी नदी है जिसका नाम गंगा है और उस पर एक बहुत बड़ा पुल है, महात्मा गांधी सेतु। हमारी दून नदी उतनी लंबी नहीं है।"
एक और बच्चे बेन वॉलेस ने बताया, "ये पटना छोटा है, भारत का पटना बहुत बड़ा है, वहां होटल-रेस्त्रां हैं, मैं एक दिन पटना जाना चाहता हूं, ये देखने, कि वो हमारे पटना से कितना अलग है। मैंने पटना की तस्वीरें देखी हैं अपने कंप्यूटर पर, और वो बहुत बड़ी जगह लगी।"
गांव का ये अतीत इस इलाक़े के लोगों के लिए एक खास मतलब रखता है। पटना प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका इसाबेल डन्सफोर्ड कहती हैं, ”बच्चों को अपनी विरासत का पता होना चाहिए। मुझे ये सोचकर बहुत खास जैसा लगता है कि हमारे इलाके में ऐसे लोग थे जो बहुत साल पहले उस पटना गए थे।
पटना गांव के लोग आज तक बिहार के पटना को बस दूर से जानते हैं, न वो कभी पटना गए, न ही पटना से कोई यहां आया। बीबीसी हिंदी के सौजन्य से पहली बार उनकी किसी पटनावासी से मुलाकात हुई। गांव, गांव ही होता है, सपनों की सीमाएँ होती हैं। सीमाएं और सिमट जाती हैं जब साधन सिमट जाएं।
समय के साथ पटना की खदानें बंद हो चुकी हैं, साथ-साथ कारखाना भी और रेलवे स्टेशन भी। गांव में रोजगार की बेहद कमी है, लोग काम की तलाश में शहर जाते हैं। ऐसे में उस देश के गांव वालों के लिए अपने गांव को नाम देने वाले शहर तक पहुंचने का सपना और दूर लगने लगता है जिस देश के सैकड़ों-हज़ारों बाशिंदे हर साल हाजीपुर-मुजफ्फरपुरकी तरह दिल्ली-मुंबई-गोवा-कोलकाता के चक्कर लगाकर हॉलिडे मनाया करते हैं।
मगर इतना तय है कि स्कॉटलैंड के पटना गांव से कभी कोई अगर भारत पहुंचा तो वो सबसे पहले देखना चाहेगा पटना।