पैदल चलकर आप कितनी दूरी तय करना चाहेंगे। एक किलोमीटर, ज्यादा से ज्यादा पांच किलोमीटर। लेकिन बात जब हजारों किलोमीटर की हो तो आप शायद पैदल चलने का ख्याल दिल से निकाल देंगे।
लेकिन ब्रिटेन में बसे भारतीय मूल के तारा सिंह बरियान के मन में ये ख्याल आता रहता था कि क्यों ना पैदल ब्रिटेन से भारत की दूरी तय की जाए।
जब भी ये सवाल उनके मन में उभरता, उन्हें बेचैन कर देता। वे सोचते कि क्या पैदल, बिना किसी गाड़ी के, बिना किसी सवारी के वे भारत पहुंच सकते हैं या नहीं। कोशिश करने पर नतीजा क्या होगा। हो पाएगा या नहीं हो पाएगा?
मन के अंदर चल रही इस उथल-पुथल को देखते हुए उन्होंने इसकी तैयारी शुरू कर दी। जूडो, व्यायाम और मैराथन दौड़ में दिलचस्पी रखने वाले तारा सिंह बरियान ने तीन साल तक की ट्रेनिंग के बाद खुद को इसके लिए तैयार कर लिया-ग्रेट ब्रिटेन से भारत की पैदल यात्रा के लिए।
हजारों मील का सफर
ग्रेट ब्रिटेन से भारत के बीच की दूरी करीब 4766 मील है। यानी 7600 किलोमीटर से भी ज्यादा। इस रास्ते में बर्फीली पहाड़ियां भी हैं और रेगिस्तान भी।
लेकिन तारा सिंह ने आखिरकार 25 अप्रैल, 1996 को ग्रेट ब्रिटेन से भारत का रूख कर लिया। 48-49 साल की उम्र हो चुकी थी, लेकिन हौसला इतिहास बनाने का था।
ग्रेट ब्रिटेन से वे सबसे पहले फ्रांस पहुंचे। फ्रांस के बाद उन्होंने इटली की दूरी को पार किया। फिर ग्रीस उसके बाद तुर्की। इसके बाद ईरान। ईरान से बलूचिस्तान पहुंचे। अपने इस सफर के बारे में बताते हुए तारा सिंह बताते हैं, “हमने सभी मुल्क का नक्शा ले लिया था। हर मुल्क के नक्शे से मैं पंजाब के नक्शे तक एक रस्सी रख देता था और उसी सीध पर मिले रास्ते पर चल पड़ता।”
इस सफर के दौरान उनके पास बस एक बैग था। उस बैग में हर जरूरी सामान था। तारा सिंह बताते हैं, “टैंट, स्टोव, स्लीपिंग बैग, नक्शा, कंपास, कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसलेटर ये सब मेरे पास था।”
फोन और चिट्ठियों का सहारा
इस सफ़र के दौरान उनके साथ मुश्किलें भी खूब आईं लेकिन तारा सिंह चलते रहे। हां इस दौरान घर वालों से फोन पर संपर्क भी बना रहा। वे बताते हैं, “मेरा जब भी मन करता, मैं लोगों से फोन पर बात कर लेता। लेकिन ग्रीस तक पहुंचने के बाद मुझे लगने लगा कि मेरा बहुत सारा पैसा तो फोन पर ही खर्च हो रहा है। ऐसे में मैं हर देश से अपने घर वालों को चिट्ठियां लिखने लगा।”
बलूचिस्तान के बाद उनका इरादा अफगानिस्तान के रास्ते भारत पहुंचना था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तारा सिंह बरियान ने बीबीसी हिंदी से बताया, “अफगानिस्तान में हालात अच्छे नहीं थे, इसलिए मुझे पाकिस्तान के रास्ते सफर करना पड़ा। मैं कह सकता हूं कि मैंने पाकिस्तान को पूरा का पूरा पार किया।”
आखिर में तारा सिंह 19 महीने के लंबे अंतराल के बाद ग्रेट ब्रिटेन से भारत पहुंचने में कामयाब हो गए। वे अपने घर पहुंचे।
'ये नशा से कम नहीं'
अपने मकसद में कामयाब होने के बाद घर पहुंचने पर उन्हें कैसा महसूस हुआ। ये सवाल पूछे जाने पर तारा सिंह ने बताया, “मैं सोच रहा था, इससे क्या हासिल हुआ। लेकिन मुझे लगा कि मैंने सोचा और इसे पूरा कर लिया। जब किसी को कोई नशा होता है तो उसे पूरा करने का मतलब क्या होता है। ये मैं जान गया हूं।”
तारा सिंह के पास इस सफर से जुड़े सारे सामान आज भी मौजूद हैं। वे अपने से मिलने वालों को इसे बड़े गर्व से दिखाते हैं।
तारा सिंह की उम्र अब 65-66 साल की हो चुकी है। लेकिन अब भी उनके मन में अपने इस कारनामे को दोहराने की चाहत है। वे कहते हैं, “मेरी उम्र तो बढ़ गई है लेकिन मेरे मन में ये विचार आता है कि इसे एक बार और करना चाहिए, लेकिन इस बार मैं कोई गाड़ी यानी मशीन का सहारा लेना पसंद करूंगा।”