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बिक गया गांधी का वसीयतनामा

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महात्मा गांधी से जुड़ी चीजों की विदेशों में नीलामी को लेकर भारत सरकार ने भले ही नाखुशी जाहिर की हो, लेकिन लंदन से सटे लडलो शहर में हुई एक नीलामी में गांधी की आखिरी वसीयत, उनकी चप्पलों और कई चीज़ों की बोली लगी।
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सबसे ऊंची कीमत में बिकी गुजराती में लिखी महात्मा गांधी की आखिरी वसीयत। दो पन्ने की गांधी की ये वसीयत 55 हजार पाउंड यानी 46,24,273 रुपए में बिकी।

इसके लिए आयोजकों ने 30 हजार से 40 हजार पाउंड की न्यूनतम बोली तय की थी। इस वसीयत को खरीदने वाले का नाम फिलहाल ज़ाहिर नहीं किया गया है।

चमड़े से बनी गहरे भूरे रंग की महात्मा गांधी की चप्पलों के लिए 19,000 पाउंड यानी 15,97,476 रुपए की बोली लगी।

ये चप्पलें मुंबई में जुहू बीच के नजदीक बने उस घर में रहने वाले लोगों से मिलीं, जहां 1917 से 1934 के बीच महात्मा गांधी रहे।

ऐतिहासिक चीजें
अलग-अलग देशों के इतिहास से जुड़ी चीज़ों और दस्तावेज़ों की इस नीलामी के लिए लडलो रेसकोर्स में इकट्ठा हुए लोगों के अलावा फोन और इंटरनेट के ज़रिए भी बोली लगाई।

ब्रितानी संसद का एक 'दस्तावेज़ जिसमें 1932 के बाद महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन को 'आतंकवादी आंदोलन' क़रार दिया गया, वो 260 पाउंड में बिका।

इसके अलावा खरीददारों और दर्शकों को देखने को मिले 1911 में हुए दिल्ली दरबार में शामिल होने के टिकट।

दिल्ली दरबार में कलकत्ता से हटाकर दिल्ली को अंग्रेज़ प्रशासित भारत की राजधानी घोषित किया गया था।

नीलामी के लिए रखी चीज़ों में गांधी के हाथों बना खादी का एक शॉल, उनकी निजी रामायण की प्रति, गांधी की एक माला और उनके हाथों से तराशी गई तीन बंदरों की एक मूर्ति भी शामिल है।
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गांधी का आकर्षण
नीलामी के आयोजक और संग्रहकर्ता रिचर्ड वेस्टवुड ब्रूक्स के मुताबिक गांधी से जुड़ी चीज़ें भारतीय ही नहीं बल्कि दुनियाभर के लोगों को आर्कषित करती हैं।

शांति के संदेश के साथ महात्मा गांधी ने जो हासिल किया वो उन्हें दुनिया की सबसे दिलचस्प और मशहूर हस्ती बनाता है।

ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों में एक बड़ा हिस्सा सिखों और पंजाबी मूल के लोगों का है।

यही वजह है कि नीलामी में शामिल सिखों के इतिहास और पंजाब के इतिहास से जुड़ी तस्वीरों और दस्तावेज़ों को खरीदने के लिए सिख समुदाय के कई लोग पहुंचे।

नीली पगड़ी और पारंपरिक नीले लबादे में सजे बर्मिंघम से आए मनदेव सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि मैं एक सिख हूं और मुझे अपने देश और अपने धर्म पर गर्व है।

अंग्रेज जब भारत से लौटे तो हमारे इतिहास और वर्तमान से जुड़ी कई चीज़ें अपने साथ बटोर लाए। इस नीलामी में आने का मेरा मकसद है जितना हो सके उन चीज़ों को वापस अपने देश पहुंचाना।

गांधी-हिटलर ‘एक साथ’
भारत के इतिहास और महात्मा गांधी से जुड़ी 150 से ज्यादा चीज़ें इस नीलामी में शामिल हुई लेकिन सबसे दिलचस्प है कि नीलामी के इस मंच पर इतिहास की दो ऐसी शख्सियतें साथ आईं जो असल ज़िंदगी में शायद कभी साथ नहीं हो सकती थीं।

महात्मा गांधी के साथ ही नाज़ी शासक अडोल्फ हिटलर की ज़िंदगी से जुड़ी कई चीज़ें और दस्तावेज़ भी इस नीलामी में शामिल थे। ज़्यादातर लोगों की नज़र हिटलर के हाथों से बने चित्रों पर टिकी रही।

सभी चित्र प्राकृतिक खूबसूरती से जुड़े थे और हर पेंटिग के कोने पर हिटलर ने अपना नाम लिखकर हस्ताक्षर किए थे।

हिटलर से जुड़ी चीज़ों में दर्जनभर से ज़्यादा ऐसे सेल्यूलॉयड चित्र भी मौजूद थे जिनका इस्तेमाल स्कूलों में बच्चों के बीच नाज़ी विचारधारा के प्रचार के लिए किया जाता था।

हालांकि महात्मा गांधी हों या हिटलर, नीलामी में आए ज्यादातर लोगों का मानना था कि बोली लगाने वालों की रुचि गांधी या हिटलर की विचारधारा में नहीं बल्कि इन चीज़ों की बढ़ती कीमत और इतिहास को सहेजने से जुड़ी है।
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पारुल अग्रवाल (बीबीसी संवाददाता, लंदन)
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