एक रिपोर्ट के मुताबिक सीरिया और इराक में सक्रिय चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट छोड़कर भागने वाले लोग खुलकर अपने अनुभव बता रहे हैं।
लंदन के किंग्स कॉलेज के 'इंटरनेशनल सेंटर फॉर द स्टडी फॉर रैडिकलाइज़ेशन' की एक रिपोर्ट में ये कहा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक कि ये लोग अपने देशों में वापस आने पर सरकारों द्वारा पकड़े जाने और आईएस के लड़ाकों के डर से छुपते रहे हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा है कि आईएस से भागने वाले 58 लोगों ने अपने अनुभव बांटे हैं जिसमें से दो तिहाई ने इस साल अपनी बात रखी।
'ये एक जेल की तरह लगता था'
रिपोर्ट के मुताबिक ये लोग नए लोगों को इस्लामिक स्टेट से नहीं जुड़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। आईएस लड़ाकों ने तुर्की के रास्ते भागने की कोशिश करते हुए कई लोगों को पकड़कर मार दिया है जबकि कई भागने में सफल रहे हैं।
आईएस से भागने वाले एक पश्चिमी देश के नागरिक अबू इब्राहिम ने कहा, "कहीं भी आने-जाने की मनाही थी जिससे ये एक जेल की तरह लगता था।"
एक व्यक्ति ने कहा, "जो बातें उनकी मान्यता से हटकर है वे उसे वह हराम मानते हैं। इस्लामिक स्टेट जिसे खारिज करता है उसे मानने वालों को वह काफिर मानते हैं और कहता है कि उसकी हत्या कर दी जानी चाहिए।"
'वो मरना नहीं चाहते थे'
शोधकर्ताओं का मनना है कि ज़्यादातर भागने वाले लोग अन्य मुसलमानों के प्रति आईएस की क्रूरता को गैर इस्लामिक मानते हैं। वहीं दो पूर्व लड़ाकों ने कहा कि वे इसलिए भागे क्योंकि उन्हें आत्मघाती बनाया जा रहा था और वो मरना नहीं चाहते थे।
बीबीसी से पिछले साल बात करने वाले इस्लामिक स्टेट से भागने वाले एक व्यक्ति ने कहा कि आईएस की क्रूरता से सभी दहशत में आ जाते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस्लामिक स्टेट के साथ आरामतलब ज़िन्दगी और बड़ी गाड़ियों के लिए जुड़ने वाले लोगों ने कहा कि जो वादे उनसे आईएस ने किए थे वो पूरे होते नहीं दिख रहे थे। दुनिया भर के देशों से कई लोग इस्लामिक स्टेट से जुड़ने के लिए सीरिया और इराक जाते रहे हैं।