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अब आयरलैंड में गर्भपात कानून पर होगा जनमत संग्रह, भारतीय दंत चिकित्सक की हुई थी मौत

Sat, 26 May 2018 01:01 AM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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आयरलैंड में भारतीय मूल के प्रधानमंत्री लियो वराडकर ने गर्भपात कानून पर से प्रतिबंध हटाने के लिए काफी चुनाव प्रचार किया। जिसके बाद शुक्रवार को इस पर जनमत संग्रह होगा। यहां एक भारतीय दंत चिकित्सक की मौत के बाद गर्भपात कानून पर बहस शुरु हुई थी। इस कानून के कारण देश की कई महिलाओं को परेशानी का सामना करना पड़ा है। 

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आज होने वाले जनमत संग्रह में बड़ी संख्या में मतदान करने का आग्रह किया गया है ताकि संविधान के 8वें संशोधन को निरस्त किया जा सके। बता दें संविधान का यह संशोधन देश में गर्भपात पर बैन लगाता है। प्रचार प्रसार के दौरान 31 वर्षीय भारतीय दंत चिकित्सक सविता हलप्पनवार की मौत का मामला भी उठाया गया। सविता की साल 2012 में समय पर गर्भपात नहीं कराने से मौत हो गई थी। 

प्रधानमंत्री वराडकर का कहना है कि 'मैं उम्मीद करता हूं कि इस जनमत संग्रह में बहुत लोग भाग लेंगे।' वहीं जनमत संग्रह पर आयरलैंड की दो प्रमुख पार्टियों फाइन गेल और फिआना फेल ने कोई आधिकारिक रुख नहीं लिया लेकिन उन्होंने अपने राजनेताओं को व्यक्तिगत रूप से प्रचार करने की अनुमति दी है।

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सविता के पिता अनदंप्पा का कहना है कि 'मुझे उम्मीद है कि आयरलैंड के लोग जनमत संग्रह के दिन मेरी बेटी सविता को याद रखेंगे और जो उसके साथ घटित हुआ ऐसा किसी अन्य परिवार के साथ नहीं होना चाहिए।' सविता के पिता ने कर्नाटक के अपने घर से फोन पर द गार्डियन को बताया कि 'मैं उसके बारे में हर दिन सोचता हूं। 8वें संशोधन के कारण मेरी बेटी को चिकित्सा उपचार नहीं मिला। उन्हें कानून बदलना होगा।' 

सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक गर्भावस्था के पहले 12 सप्ताह के भीतर महिलाएं गर्भपात करा सकती हैं। उसके बाद गर्भपात के 24वें सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति उसी समय दी जाएगी जब महिला के जीवन को खतरा हो या उसे शारीरिक और मानसिक रूप से गंभीर नुकसान होने का जोखिम हो। लेकिन ये प्रस्ताव तब ही लागू होगा जब अधिक संख्या मेंं लोग कानून निरस्त करने के लिए वोट करेंगे।

इस कानून को खत्म करने वाले समर्थकों ने हैशटैग होम टू वोट नाम से सोशल मीडिया पर एक कैंपेन भी शुरू किया था, जिसका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रेरित करना था कि वह प्रतिबंध को हटाने के लिए मतदान करें। हाल के पोल पर नजर डालें तो 56 फीसदी लोग ऐसे हैं जो इस कानून को खत्म करने के हक में हैं। वहीं 27 फीसदी लोग नहीं चाहते कि इस पर से प्रतिबंध हटे।  
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