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अब इस विवाद का अंत हो: सांविधानिक संस्थानों की स्वायत्तता को और मजबूत बनाने की जरूरत, यही लोकतंत्र के लिए शुभ

विराग गुप्ता
Updated Tue, 29 Sep 2026 09:17 AM IST

सार

चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद को लेकर चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण के बाद सांविधानिक दृष्टि से यह विवाद खत्म हो जाना चाहिए। लोकतंत्र के लिए भी यही शुभ होगा। हालांंकि, इससे सबक लेकर सांविधानिक संस्थानों की स्वायत्तता को और मजबूत बनाने की जरूरत है।
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (फाइल) - फोटो : Youtube वीडियो ग्रैब


1989 में मुख्य चुनाव आयुक्त आरवीएस पेरी शास्त्री ने दो नए आयुक्तों की नियुक्ति का विरोध किया। उसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने संसद से पारित कानून को चुनौती देते हुए अन्य दो आयुक्तों को काम करने की इजाजत ही नहीं दी। शेषन के विरोध को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीनों चुनाव आयुक्तों को बराबरी का सांविधानिक दर्जा देने का फैसला दिया। लेकिन, तीन सदस्यीय आयोग में आंतरिक विरोधाभासों का सिलसिला जारी रहा। 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ राजनीतिक जुड़ाव की शिकायत की थी, लेकिन हटाने के बजाय चावला को अगले मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर नियुक्त कर दिया गया।


चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति हेतु स्वतंत्र कॉलेजियम बनाने के लिए 2015 में याचिका दायर हुई थी। उसके आठ साल बाद सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने नया कानून बनाने का आदेश दिया। संसद से बने नए कानून में तीन सदस्यीय चयन समिति में प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और केंद्रीय मंत्री हैं। केंद्रीय मंत्री के बजाय समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज को शामिल करने के लिए एक नई याचिका दायर हुई थी। उस पर तीन साल बाद दो जजों की पीठ का खंडित फैसला आया। चुनाव आयोग के आंतरिक विवादों की मीडिया रिर्पोटिंग के बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सनसनी ज्यादा बढ़ गई। पर, उच्चतम न्यायालय के फैसले की खामियों का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए।


पुराने मामले में पांच जजों की संविधान पीठ का फैसला था, तो नई याचिका के लिए दो जजों की बेंच क्यों बनाई गई? दूसरे न्यायाधीश के फैसले के अनुसार, संविधान पीठ में सुनवाई होनी चाहिए, तो याचिका को तीन साल तक लंबित क्यों रखा गया? जज के बेटे चुनाव आयोग के वकील हैं, तो हितों के विरोधाभास के आधार पर उन्होंने सुनवाई में शामिल होने से इन्कार क्यों नहीं किया? मुख्य चुनाव आयुक्त की आईएएस बेटी से जुड़े एक मामले की सुनवाई उन्हीं जज की पीठ के सामने आने के बाद न्यायिक व्यवस्था भी आलोचना के घेरे में आ गई। पुरानी घटनाओं से सबक लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार और पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की कमियों को चुनाव आयोग से जोड़कर सोशल मीडिया पर अभियान चलाने से सांविधानिक संस्थानों पर लोगों का भरोसा डगमगाता है।


सिर्फ भारत के नागरिकों के नाम ही वोटर लिस्ट में शामिल हो सकते हैं। इसे सुनिश्चित करने के लिए सिलसिलेवार तरीके से राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया हो रही है। बिहार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को मंजूरी दी थी। तब चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि बिहार के अनुभवों से सबक लेकर एसआईआर की प्रक्रिया सरल और व्यावहारिक बनाने की जरूरत है। चुनाव आयुक्त संधू ने भी पिछले साल लिखित तौर पर ऐसी ही राय व्यक्त की थी। वर्तमान मामले में शालीन तरीके से विवाद का पटाक्षेप होना चुनाव आयोग के साथ लोकतंत्र के लिए शुभ है। पर, 13 करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट से बाहर होने के कारण बढ़ रहे विवाद और आक्रोश का समाधान भी जरूरी है। 99 फीसदी से अधिक नोटिस नाम, उम्र और मैपिंग में गड़बड़ी के कारण जारी हुए हैं। इससे साफ है कि जो लोग घुसपैठिये नहीं हैं, उन्हें तकनीकी कारणों से बेवजह परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।


बंगलूरू में पासपोर्ट धारकों से भी नागरिकता का सर्टिफिकेट मांगा जा रहा है, जिसके बारे में संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। दिल्ली में हल्ला मचने के बाद वीआईपी लोगों को नोटिस देने के बजाय फील्ड विजिट के आधार पर मतदाता सूची में शामिल करने की पहल हुई है। इसी तरह से पासपोर्ट धारक, सरकारी अधिकारी, पीएसयू कर्मी, वकील, डॉक्टर, सीए, जज, विधायक, सांसद और सामान्य करदाताओं को एसआईआर की कठोर प्रक्रिया से दूर रखकर वोटर लिस्ट में उनका नाम बरकरार रखने की जरूरत है। इससे घुसपैठिये और संदिग्ध लोगों के कागजातों की जांच बेहतर तरीके से हो सकेगी।


नए मतदाताओं को शामिल करने वाले फॉर्म-6 के साथ जुड़े नए घोषणापत्र को उच्चतम न्यायालय का अनुमोदन मिल चुका है। लेकिन, बेवजह उत्पीड़न से चुनावी प्रक्रिया को लेकर लोगों का विश्वास कम हो सकता है, जिससे अंतत: लोकतंत्र को ही नुकसान होगा। पश्चिम बंगाल में लाखों लोगों के मुकदमों के विवाद के निपटारे में अदालतों को दशकों लग जाएंगे। मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए सभी राज्यों में विवाद और मुकदमेबाजी बढ़ने से भी लोगों का चुनावी प्रक्रिया में भरोसा कमजोर होगा। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की तर्ज पर मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की प्रक्रिया आसान होनी चाहिए। आयोग को खास प्रयास करके जेन-जी को भटकने से बचाते हुए उन्हें वोट की ताकत और मतदान के महत्व के प्रति जागरूक करना चाहिए। चुनाव आयुक्तों के कैबिनेट सचिव को लिखे पत्र पर दिए गए स्पष्टीकरण के मुताबिक, विवाद अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से जुड़ा है। कहा जा रहा है कि सांविधानिक पदों पर बैठे लोगों को राष्ट्रपति के पास अपनी शिकायत दर्ज करानी चाहिए। इस विवाद से सबक लेकर चुनाव आयोग जैसे सांविधानिक संस्थान की स्वायत्तता को और मजबूत बनाने की जरूरत है। आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म के केंदीकृत होने से जुड़े विवाद का पटाक्षेप हो गया है। अब एसआईआर के दौरान इकट्ठा किए जा रहे दस्तावेजों और डाटा की सुरक्षा को और पुख्ता करने का प्रयास होना चाहिए।
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जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उसके आठ साल बाद सुप्रीम कोर्ट में कई मुख्य न्यायाधीशों के आने के बावजूद, मुकदमों की लिस्टिंग, सुनवाई और बेंच आवंटन की कार्यप्रणाली में संस्थागत सुधार नहीं हुए। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में जजों की असहमति सार्वजनिक तौर पर दिखती है। चुनाव आयोग में अगर दो आयुक्त असहमत हों, तो अल्पमत का फैसला लागू नहीं हो सकता। पर, किसी एक आयुक्त की असहमति के बाद बहुमत से फैसला लिया गया हो, तो फाइल में रिकॉर्ड करने के साथ सार्वजनिक आदेश में भी विवरण दिया जा सकता है। ऐसी पारदर्शिता से चुनाव आयोग की साख और बढ़ेगी।

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