पश्चिमी देशों ने अचानक बड़े पैमाने पर ताइवान को पनडुब्बी तकनीक देने की होड़ लग गई है। बताया जाता है कि ऐसा ताइवान पर चीन के हमले की बढ़ती आशंका के कारण हुआ है। ताइवान को हाल में पनडुब्बी बनाने की टेक्नोलॉजी, उपकरण और इस कार्य में माहिर कर्मी उपलब्ध कराए गए हैं। वेबसाइट एशिया टाइम्स ने अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में बताया है कि ताइवान बीते दो दशक से पश्चिमी देशों से आधुनिक पनडब्बियों की मांग कर रहा था। लेकिन अमेरिका सहित किसी देश ने उस पर ध्यान नहीं दिया। जबकि अब पनडुब्बी निर्माण में मदद देने के लिए विभिन्न देशों की ताइवान के सामने कतार लग गई है।
इस रिपोर्ट में एक समाचार एजेंसी के हवाले से बताया गया है कि ताइवान को लड़ाकू पनडुब्बियों के निर्माण के लिए टेक्नोलॉजी मुख्य रूप से अमेरिका से मिली है। अमेरिका ने उसे आधुनिक उपकरण भी दिए हैं। उधर ब्रिटेन की रक्षा कंपनियों ने भी महत्त्वपूर्ण सहायता मुहैया कराई है। ब्रिटेन के अनुभवी विशेषज्ञ और रिटायर्ड कोमोडर इयन मैकगही ताइवान को अपनी सेवा उपलब्ध कराने वाले एक्सपर्ट्स में शामिल हैं। एशिया टाइम्स के मुताबिक बीते तीन वर्षों में ब्रिटेन ने ताइवान के लिए रक्षा निर्यात के कई लाइसेंस जारी किए हैं।
अमेरिका-ताइवान बिजनेस काउंसिल के अध्यक्ष रुपर्ट हैमंड-चैंबर्स ने एशिया टाइम्स से कहा- ‘ताइवान को दुनिया भर से टेक्नोलॉजी और उपकरण जुटाने पड़े, क्योंकि अपने यहां इन्हें निर्मित करने में वह अक्षम है।’ बताया जाता है कि ताइवान में पनडुब्बी बनाने की परियोजना 2017 में शुरू हुई। तब इसे स्वदेशी रक्षा पनडुब्बी कार्यक्रम के तहत शुरू किया गया था। लेकिन पनडुब्बी का असल निर्माण पिछले साल ही शुरू हो पाया। इसके तहत आठ पनडुब्बियां बनाने की योजना है। बताया जाता है कि उनमें से पहली पनडुब्बी 2025 तक बन कर तैयार हो जाएगी। इस पूरी परियोजना पर 16 अरब डॉलर का खर्च आएगा।
इस खबर के बारे में एशिया टाइम्स को अपनी प्रतिक्रिया देते हुए चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि ताइवान के अधिकारी विदेशी ताकतों के साथ मिलीभगत कर रहे हैं। उन्होंने मदद दे रहे देशों को चेतावनी देते हुए कहा- ‘ताइवान के साथ सैनिक संबंध बनाना और ताइवान की अलगाववादी ताकतों की मदद करना ये देश बंद कर दें।’ प्रवक्ता ने कहा- ये देश आग से खेल रहे हैं और जो आग से खेलता है, वह जल जाता है।