फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

India-US: रिश्तों में मिठास की उम्मीदें, भारत-यूएस की बढ़ेगी रणनीतिक साझेदारी, ड्रैगन की दबंगई पर कसेगी लगाम

Thu, 07 Nov 2024 04:15 AM IST
शिव शुक्ला हिमांशु मिश्र

सार

अकल्पनीय फैसलों के लिए मशहूर डोनाल्ड ट्रंप 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में हारने के बाद अब जीतकर फिर व्हाइट हाउस पहुंच गए हैं। अरबपति कारोबारी ट्रंप ने 2016 में डेमोक्रेटिक प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन को हराया था तो इस बार कमला हैरिस को मात दी। पहले कार्यकाल में ट्रंप आतंकवाद और पाकिस्तान के मुद्दे पर भारत का साथ देते रहे। अब एशिया-प्रशांत में ड्रैगन को नाथने के लिए भारत से सामरिक-रणनीतिक साझेदारी बढ़ाना ट्रंप की मजबूरी होगी।
विज्ञापन
पीएम मोदी और अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : एएनआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

चार साल के अंतराल के बाद डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद दुनिया की निगाहें उनकी नीतियों और निर्णयों पर टिकी हैं। विशेषज्ञों को लगता है कि ट्रंप पहले कार्यकाल की नीतियों पर डटे रहे तो भारत और अमेरिका के बीच सामरिक और रणनीतिक भागदारी बढ़ेगी। नए राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप का लक्ष्य एशिया प्रशांत क्षेत्र के साथ एशिया में चीनी प्रभुत्व पर लगाम कसने के लिए क्वाड को न सिर्फ मजबूती मिलेगी, बल्कि अमेरिका बहुत हद तक भारत पर निर्भर रहेगा।
विज्ञापन


ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दोस्ती किसी से छिपी नहीं है। पिछले चुनाव में पीएम मोदी ने अमेरिका में अनिवासी भारतीयों से जुड़े कार्यक्रम में फिर एक बार ट्रंप सरकार का नारा दिया था। हालांकि तब ट्रंप हार गए थे। इस चुनाव में भी ट्रंप ने बांग्लादेश में हिंदुओं, ईसाइयों के उत्पीड़ पर सख्त बयान देते हुए कट्टर लेफ्ट के धर्मविरोधी एजेंडे से हिंदू अमेरिकियों को बचाने और अपने नए कार्यकाल में अपने दोस्त नरेंद्र मोदी के साथ संबंधों को और मजबूत करने की घोषणा की थी।

नई दिल्ली की उम्मीद
  • कूटनीतिक विशेषज्ञों को लगता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत की रूस से बढ़ती नजदीकी मामले में ट्रंप का रुख अपने पूर्ववर्ती जो बाइडन से उदार होगा। बाइडन का इस मामले में रुख बेहद सख्त था, हालांकि भारत ने इसकी ज्यादा परवाह नहीं की।
  •  दूसरा मामला अमेरिका और कनाडा में खालिस्तानी गतिविधियों से जुड़ा है। खासतौर पर निज्जर हत्याकांड के बाद भारत और कनाडा के कूटनीतिक रिश्ते बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
  •  इसके अलावा अलगाववादी गुरुपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की कथित साजिश मामले में दोनों देशों के बीच खींचतान है। विशेषज्ञों को लगता है कि इन दोनों ही मामलों में    अमेरिका के रुख में बदलाव की संभावना है।
विज्ञापन

...पर अमेरिका फर्स्ट नीति से घाटा
अमेरिका फर्स्ट नीति की राह पर चलते हुए ट्रंप ने बेरोजगारी के खात्मे के लिए रोजगार का पहला अवसर अमेरिकियों को देने के इरादे जताए हैं। ट्रंप ने पहले कार्यकाल में एच-1 बी वीजा की शर्तें कड़ी कर दी थीं। इसका प्रतिकूल प्रभाव भारत के आईटी इंडस्ट्री पर पड़ा था। ट्रंप ने अमेरिकी सामान पर आयात शुल्क घटाने का दबाव भी पर डाला था।

पाकिस्तान को झटका मगर कश्मीर पर नया रुख
वैसे तो राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान पर भारत की जवाबी कार्रवाई के समर्थन में कहा था कि भारत को आत्मरक्षा का अधिकार है। लेकिन कश्मीर पर मध्यस्थता की बात भी कह दी थी। फिर भी ट्रंप के पहले कार्यकाल में पाकिस्तान की नकेल भी कसी गई। उसे मदद में बड़ी कटौती की गई। चूंकि पाकिस्तान और बांग्लादेश चीन के बेहद करीब है। ऐसे में ट्रंप का पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रति नरम रुख अपनाने के संकेत नहीं हैं।

पाकिस्तान को झटका मगर कश्मीर पर नया रुख
वैसे तो राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान पर भारत की जवाबी कार्रवाई के समर्थन में कहा था कि भारत को आत्मरक्षा का अधिकार है। लेकिन कश्मीर पर मध्यस्थता की बात भी कह दी थी। फिर भी ट्रंप के पहले कार्यकाल में पाकिस्तान की नकेल भी कसी गई। उसे मदद में बड़ी कटौती की गई। चूंकि पाकिस्तान और बांग्लादेश चीन के बेहद करीब है। ऐसे में ट्रंप का पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रति नरम रुख अपनाने के संकेत नहीं हैं।

पहले कार्यकाल में खट्टे-मीठे रिश्ते...
ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान मामले में भारत को अमेरिका का साथ तो मिला, लेकिन कश्मीर को लेकर रवैया ढुलमुल रहा। तब ट्रंप ने भारत को विश्वास में लिए बिना जिस तरह अफगानिस्तान में तालिबान से समझौता कर अपनी सेना वापस बुलाई, उसकी भारत को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इसी प्रकार भारत एच-1 बी वीजा मामले में लगातार संघर्ष करता रहा। ग्लोबल वार्मिंग में कमी पर भी दोनों देशों की राय अलग-अलग रही। उस दौरान भारत को कश्मीर मामले में अमेरिकी की मध्यस्थता की पेशकश ठुकरानी पड़ी। दोनों देशों के बीच आयात मामले में टैरिफ कम करने के मामले में भी मतभेद सार्वजनिक हुए।

भारत क्यों है मजबूरी?
बाइडन प्रशासन ने भी चीन के दखल को कम करने के लिए पूरी ताकत लगाई थी। चीन मुद्दे पर अमेरिका के पास भारत के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति का भारत को कूटनीतिक लाभ होगा।
विज्ञापन


विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें