एओसी उस धड़े से जुड़ी हैं, जिसके सदस्य सोशलिस्ट नेता बर्नी सैंडर्स को अपना मार्ग-दर्शक मानते हैं। सैंडर्स यह पहले ही कह चुके थे कि जो बाइडन के जीतने के बाद वे अपना सौ दिन का एजेंडा जारी करेंगे। वे मांग करेंगे कि भावी बाइडन प्रशासन इस पर सौ दिन में अमल करे, वरना सोशलिस्ट और प्रगतिशील खेमा आंदोलन की राह अपनाएगा।
रविवार को सैंडर्स ने यही बात कहते हुए फिर से अपना एक वीडियो जारी किया। सैंडर्स के एजेंडे में न्यूनतम मजदूरी 15 डॉलर प्रति घंटे करना, कॉलेज और यूनिर्सिटी की शिक्षा मुफ्त करना, सबको स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा मुफ्त मुहैया करना, और जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए ग्रीन इंडस्ट्री और इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की योजना पर काम शुरू करना प्रमुख है।
इस चुनाव में प्रगतिशील खेमे को काफी कामयाबी मिली है। उसने सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव के 30 सदस्य डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर खड़े किए थे। उनमें से 26 जीत गए। उनमें एओसी, रशिदा तलाइब, इल्हान उमर, अनाया प्रेसली, कोरी बुश और भारतीय मूल के रो खन्ना और प्रमिला जयपाल भी शामिल हैं। इसके अलावा चुनाव के साथ कई शहरों की सिटी काउंसिल ने न्यूनतम मजदूरी, शिक्षा को पब्लिक सेक्टर में लाने और स्वास्थ्य देखभाल की सेवाओं में विस्तार के सवालों पर जनमत संग्रह भी कराए थे, जिनमें कई जगहों पर इन मुद्दों की जीत हुई। 15 डॉलर प्रति घंटे न्यूनतम मजदूरी का मुद्दा फ्लोरिडा राज्य में भी पास हो गया, जहां से चुनाव डोनाल्ड ट्रंप जीते हैं। इस कामयाबी से प्रगतिशील खेमे का उत्साह बढ़ा हुआ है।
इससे दक्षिणपंथी खेमा चिंतित है। उसकी दलील है कि पुलिस के बजट में कटौती और पब्लिक सेक्टर में शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं को लाने की मांग से समाज के कंजरवेटिव हिस्से में उलटी प्रतिक्रिया हुई। इस कारण डेमोक्रेटिक पार्टी को उतनी बड़ी जीत हासिल नहीं हो सकी, जिसकी उम्मीद की गई थी।
दोनों खेमो में टकराव पैदा होगा, ये अनुमान पहले से था। लेकिन यह जीत के दिन ही शुरू हो जाएगा, यह नहीं सोचा गया था। इस टक्कर ने जो बाइडन के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है- वे किस तरफ झुकें। दोनों में से किसी पक्ष को असंतुष्ट करने के अपने नुकसान है। लेकिन बाइडन मध्यमार्गी और समझौता कर चलने वाले माने जाते हैं। अब उनकी इस क्षमता का कड़ा इम्तहान होगा।