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'ब्रेग्जिट' बन गया बोरिस जॉनसन के गले की फांस

Mon, 09 Nov 2020 05:15 PM IST
अनिल पांडेय वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन

सार

  • यूरोपीय संघ से ब्रिटेन को अलग करने के वादे के साथ ही जॉनसन ने जीता था पिछला चुनाव
  • अब तक नहीं पूरी हो सकी प्रक्रिया, वार्ताओं का दौर जारी
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ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन - फोटो : PTI
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विस्तार
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यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने की प्रक्रिया यानी ब्रेग्जिट के लिए ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के बीच बातचीत सोमवार को यहां फिर शुरू हुई। गौरतलब है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और यूरोपीय संघ (ईयू) की अध्यक्ष उरसुला वॉन डेर लेयन के बीच फोन पर हुई बातचीत में ये सहमति बनी थी कि दोनों पक्षों के बीच ब्रेग्जिट के लिए चल रही वार्ताएं शुक्रवार को समाप्त हुए हफ्ते तक पूरी कर ली जाएंगी। लेकिन ये समय सीमा गुजर गई और ऐसा नहीं सका। अब तक ब्रेग्जिट पूरा ना हो पाने के कारण ब्रिटेन में जॉनसन की लोकप्रियता तेजी से घटी है। पिछले साल आम चुनाव में उन्होंने वादा किया था कि वे 31 दिसंबर 2019 तक ब्रेग्जिट संपन्न कर लेंगे। इस वादे पर उन्हें जबर्दस्त समर्थन मिला था।

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पिछले हफ्ते चली वार्ताओं के बाद वॉन डेर लियेन ने कहा कि कुछ प्रगति हुई है, लेकिन बड़े मतभेद अभी कायम हैं। मतभेद दोनों पक्षों के बीच होने वाले व्यापार और सुरक्षा समझौते को लेकर हैं। तय लक्ष्य के मुताबिक 15 नवंबर तक इन समझौतों को ब्रिटिश और यूरोपीय संघ की संसद को पारित कर देना था। लेकिन अब ऐसा हो पाने की संभावना न्यूनतम है।


ब्रिटिश प्रधानमंत्री के कार्यालय ने कहा है कि अब दोनों पक्षों को वार्ताओं में दोगुना ताकत लगानी होगी। उसके बयान में कहा गया कि कुछ प्रगति के बावजूद तथाकथित  समान धरातल कायम करने को लेकर मतभेद कायम हैं। बयान में कहा गया कि दोनों पक्ष वार्ता को जारी रखने पर सहमत हैं और सोमवार से लंदन में बातचीत को आगे बढ़ाया जाएगा। इस दौरान जल्द से जल्द समझौता पूरा करने के लिए और ज्यादा ताकत लगाई जाएगी। वार्ताओं में ईयू के दल का नेतृत्व उसके मुख्य वार्ताकार माइकल बर्नियर और ब्रिटिश दल का नेतृत्व वहां के मुख्य वार्ताकार डेविड फ्रॉस्ट कर रहे हैं।
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इन बयानों और इरादों से इतर जानकारों का कहना है कि दोनों पक्षों में मतभेद बहुत गहरे हैं। ब्रिटिश अखबार द गार्जियन के मुताबिक पिछले हफ्ते बर्नियर ने एक निजी बातचीत में यह कहा था कि वार्ता समझौते तक पहुंचने की राह पर चलती नहीं दिख रही है। समुद्र में मछली मारने के अधिकार को लेकर दोनों पक्ष में तीखे मतभेद हैं। तट से छह से 12 मील तक समुद्र में मछली मारने का दोनों पक्षों का कोटा कितना हो, यह तय नहीं हो पा रहा है।

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ईयू के सदस्य देशों फ्रांस और आयरलैंड के लिए यह बड़ा मुद्दा है। दोनों देशों का कहना है कि ब्रिटेन अब जहां अपना हक जता रहा है, वहां उनके मछुआरे सदियों से मछली मारते रहे हैं। फिर दोनों देश अपने उद्योगों को किस हद तक सब्सिडी दे सकते हैं, इस पर भी सहमति नहीं बन पा रही है। ईयू की तरफ से सब्सिडी के मामले में ही समान धरातल कायम करने की दलील दी जा रही है।

जॉनसन की मुश्किल यह है कि उन्हें ऐसा ब्रेग्जिट हासिल करना है, जिससे वे अपनी जनता को उससे होने वाले फायदे दिखा सकें। ब्रिटेन में यूरोपीय संघ को लेकर नाराजगी इसी बात पर फैली थी कि उसका सदस्य रहने के कारण उसके उद्योग धंधों को नुकसान होता है और ईयू के आसान नियमों के कारण उसके यहां विदेशों से आव्रजक आकर बस जाते हैं। ईयू का जोर इस बात पर भी है कि उत्पादित वस्तुओं का अंतरराष्ट्रीय मानक दोनों पक्षों की सहमति से तय हों। इस पर ब्रिटेन राजी नहीं है, जबकि बर्नियर ने कहा है कि अगर इस पर सहमति नहीं बनी तो पूरी बातचीत पटरी से उतर सकती है।

मुद्दा यह है कि अगर जॉनसन इस सारी बातों पर राजी हो जाते हैं, तो देश में पूछा जाएगा कि फिर ब्रेग्जिट से फायदा क्या हुआ? अगर ईयू के मानकों के मुताबिक सब चलना है, तो फिर अलग होने से ब्रिटेन के लोगों को कैसे खास लाभ होगा? और अगर जॉनसन इस पर राजी नहीं होते हैं, तो वार्ताएं लंबी खिचेंगी। तब जल्द ब्रेग्जिट दिलाने के जॉनसन के वादे पर सवाल उठेंगे। तो कुल मिलाकर जॉनसन मुसीबत में फंसे दिखते हैं।  
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