ईयू के सदस्य देशों फ्रांस और आयरलैंड के लिए यह बड़ा मुद्दा है। दोनों देशों का कहना है कि ब्रिटेन अब जहां अपना हक जता रहा है, वहां उनके मछुआरे सदियों से मछली मारते रहे हैं। फिर दोनों देश अपने उद्योगों को किस हद तक सब्सिडी दे सकते हैं, इस पर भी सहमति नहीं बन पा रही है। ईयू की तरफ से सब्सिडी के मामले में ही समान धरातल कायम करने की दलील दी जा रही है।
जॉनसन की मुश्किल यह है कि उन्हें ऐसा ब्रेग्जिट हासिल करना है, जिससे वे अपनी जनता को उससे होने वाले फायदे दिखा सकें। ब्रिटेन में यूरोपीय संघ को लेकर नाराजगी इसी बात पर फैली थी कि उसका सदस्य रहने के कारण उसके उद्योग धंधों को नुकसान होता है और ईयू के आसान नियमों के कारण उसके यहां विदेशों से आव्रजक आकर बस जाते हैं। ईयू का जोर इस बात पर भी है कि उत्पादित वस्तुओं का अंतरराष्ट्रीय मानक दोनों पक्षों की सहमति से तय हों। इस पर ब्रिटेन राजी नहीं है, जबकि बर्नियर ने कहा है कि अगर इस पर सहमति नहीं बनी तो पूरी बातचीत पटरी से उतर सकती है।
मुद्दा यह है कि अगर जॉनसन इस सारी बातों पर राजी हो जाते हैं, तो देश में पूछा जाएगा कि फिर ब्रेग्जिट से फायदा क्या हुआ? अगर ईयू के मानकों के मुताबिक सब चलना है, तो फिर अलग होने से ब्रिटेन के लोगों को कैसे खास लाभ होगा? और अगर जॉनसन इस पर राजी नहीं होते हैं, तो वार्ताएं लंबी खिचेंगी। तब जल्द ब्रेग्जिट दिलाने के जॉनसन के वादे पर सवाल उठेंगे। तो कुल मिलाकर जॉनसन मुसीबत में फंसे दिखते हैं।