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Defence: रक्षा मंत्री US में कर रहे डील्स! लेकिन कौन सा देश है भारत के डिफेंस प्रोडक्ट्स का सबसे बड़ा ग्राहक?

हरेंद्र चौधरी
Updated Sat, 24 Aug 2024 09:03 PM IST

सार

इस साल अप्रैल-जून के दौरान भारत का रक्षा निर्यात 6,915 करोड़ रुपये रहा। यह पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि के 3,885 करोड़ रुपये के आंकड़े से 78 फीसदी अधिक है। जबकि पिछले साल की तरह ही इस साल भी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी क्रमशः 60 फीसदी और 40 फीसदी रही है।
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भारत का रक्षा निर्यात। - फोटो : अमर उजाला


जियोपॉलिटिकल टेंशन ने बदली आबोहवा

इस साल अप्रैल-जून के दौरान भारत का रक्षा निर्यात 6,915 करोड़ रुपये रहा। यह पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि के 3,885 करोड़ रुपये के आंकड़े से 78 फीसदी अधिक है। जबकि पिछले साल की तरह ही इस साल भी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी क्रमशः 60 फीसदी और 40 फीसदी रही है। पिछले एक दशक में भारत ने अपने रक्षा निर्यात में जबरदस्त उछाल आया है, जो पिछले 10 सालों में 31 फीसदी बढ़ा है। भारत अब 90 से ज़्यादा देशों को सैन्य हार्डवेयर निर्यात कर रहा है। वहीं ज्योपॉलिटिकल टेंशन रूस-यूक्रेन युद्ध और इस्राइल-हमास युद्ध से भी निर्यात में बढ़ोतरी हुई है और भारत एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता देश के तौर पर उभरा है। वहीं भारत का लक्ष्य अगले 2028-29 तक तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाना है। इस साल अप्रैल में रक्षा मंत्रालय ने एलान किया था कि वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान भारत का रक्षा निर्यात 32.5 फीसदी बढ़ा और पहली बार 21,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर गया, क्योंकि सरकार का फोकस स्वदेशी डिफेंस मैन्यूफैक्चरिंग इकोसिस्टम के साथ-साथ सैन्य निर्यात को बढ़ावा देने पर रहा।  


क्या-क्या निर्यात कर रहा है भारत

इस समय सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियां मिलिट्री हार्डवेयर में डोर्नियर-228, मिसाइल, तोपें, रॉकेट, आर्मर्ड व्हीकल्स, स्नाइपर राइफलें, आर्टिलरी गन, बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट, ड्रोन, ब्रह्मोस मिसाइल, पिनाका रॉकेट, हल्के टॉरपीडो, सिमुलेटर, ऑफशोर पेट्रोल वेसेल्स, पर्सनल प्रोटेक्टिव गियर्स, विभिन्न प्रकार के रडार, सर्विलांस सिस्टम और गोला-बारूद सहित कई तरह के सैन्य उत्पादों का निर्यात कर रही हैं। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इन निर्यातों ने शीर्ष 25 हथियार निर्यातक देशों में भारत की स्थिति को काफी मजबूत किया है, जो भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है। 


ब्रह्मोस, आकाश ने रक्षा निर्यात को दी नई ऊंचाई  

हालांकि रक्षा मंत्रालय ने इस लेकर कोई जानकारी नहीं दी है कि किस देश को कौन से हथियारों की सप्लाई हुई है। लेकिन जो आंकड़े सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हैं उनमें फिलीपींस प्रमुख है, जिसने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की खरीद का सौदा किया था। दोनों देशों के बीच 2022 में इस हथियार प्रणाली को लेकर 375 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 31.26 अरब रुपये) का सौदा हुआ था। वहीं फिलीपींस ने एलसीए एमके1ए, एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर एमके II और भारत में निर्मित युद्धपोतों को लेकर गहरी रुचि दिखाई है। इसके अलावा नाइजीरिया से भी तेजस और प्रचंड के अलावा लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (एलयूएच) और एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (एएलएच) 'ध्रुव' को लेकर बातचीत चल रही है। इसके अलावा पूर्वी एशियाई देश वियतनाम जल्द ही भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीद सकता है। 


वहीं, ब्राजील भारत के आकाश एयर डिफेंस सिस्टम में अपना इंट्रेस्ट दिखा रहा है। इसके अलावा म्यांमार पारंपरिक रूप से भारत के रक्षा उत्पादों का बड़ा बाजार रहा है। हाल के सालों में इस्राइल और आर्मेनिया जैसे देश भी महत्वपूर्ण खरीदार बनकर उभरे हैं। इस्राइल कुछ साइट सिस्टम के अलावा छोटे हथियारों के साथ-साथ कुछ फ़्यूज़ और गोला-बारूद के अलावा ड्रोन के पार्ट्स का आयात करता है। वहीं आर्मेनिया ने भारत से तोपों के एयर डिफेंस सिस्टम आकाश खरीदे हैं। 


भारत की मदद से ऑफसेट कमिटमेंट्स को पूरा करता है अमेरिका

बावजूद इसके, भारतीय रक्षा उत्पादों का सबसे बड़ा आयातक देश अमेरिका है, जो भारत के कुल रक्षा निर्यात का लगभग 50 फीसदी हिस्सा है। इसका मुख्य कारण यह है कि अमेरिकी कंपनियां अपने ग्लोबल सप्लाई चेन नेटवर्क और अपने ऑफसेट कमिटमेंट्स को पूरा करने के लिए भारत से हर साल एक अरब डॉलर से अधिक कीमत के सिस्टम, सबसिस्टम और पुर्जे खरीदती हैं। इन कंपनियों में बोइंग और लॉकहीड मार्टिन सबसे आगे हैं। अमेरिकी कंपनी बोइंग भारत में टाटा ग्रुप के साथ मिल कर हैदराबाद में टाटा बोइंग एयरोस्पेस लिमिटेड (TBAL) बनाई है, 14,000 स्कॉवयर मीटर में फैली इस फैसिलिटी में AH-64 अपाचे हेलीकॉप्टर के लिए एयरो-स्ट्रक्चर बनाती है। यहां से 200 से अधिक अपाचे फ्यूज़लेज और दूसरे एयरक्राफ्ट कंपोनेंट्स की सप्लाई की जा चुकी है। जबकि टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) के साथ मिल कर लॉकहीड मार्टिन C-130J ट्रांसपोर्ट एय़रक्राफ्ट के लिए 200 से अधिक एम्पेनेज का निर्माण करता है और दूसरा S-92 हेलीकॉप्टर के लिए 157 से अधिक केबिन की डिलीवरी कर चुका है। 


इसके अलावा बेंगलुरु स्थित रॉसेल टेकसिस एएच-64 अपाचे के लिए वायर हार्नेस और इलेक्ट्रिकल पैनल बनाती है। साथ ही, वी-22 ऑस्प्रे, सीएच-47 चिनूक, एफ-15 और एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट जैसे लड़ाकू विमान के लिए हार्नेस का निर्माण भी करती है।  वहीं, बेंगलुरु में ही SASMOS HET टेक्नोलॉजीज F/A-18 सुपर हॉर्नेट और F-15 स्ट्राइक ईगल के लिए इलेक्ट्रिकल पैनल असेंबली बनाती है। सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड F/A-18 गन बे डोर बनाती है, जबकि भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) P-8I के लिए IFF कॉम्बैट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम और स्पीच सीक्रेसी सिस्टम की मैन्यूफैक्चरिंग करती है।
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ये कंपनियां है अव्वल

लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि एचएएल, बीडीएल और बीईएल जैसी सरकारी कंपनियों को छोड़ दें, तो भारत के रक्षा निर्यात को आगे बढ़ाने में करीब 100 घरेलू कंपनियों ने अहम भूमिका निभाई है। लेकिन टॉप कंपनियों की लिस्ट में टाटा ग्रुप, कल्याणी, एलएंडटी या महिंद्रा डिफेंस नहीं है। बल्कि रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि बेंगलुरु स्थित इंडो-एमआईएम टॉप पर है। यह कंपनी मेटल इंजेक्शन मोल्डिंग (एमआईएम) बनाती है। अमेरिका, यूरोप और एशिया के 50 से अधिक देश इसके ग्राहक हैं। भारत के अलावा, इसकी मैन्यूफैक्चरिंग फैसिलिटी अमेरिका और यूके में भी हैं। 


रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि सरकारी कंपनी म्यूनिशंस इंडिया, जो कई तरह के रॉकेट, तोप के गोले और अन्य युद्ध सामग्री और गोलाबारूद बनाती है। यह कंपनी रक्षा निर्यात की दौड़ में सबसे आगे है। सूत्रों ने बताया कि कंपनी के पास अगले तीन साल के लिए लगभग 6,000 करोड़ रुपये के ऑर्डर हैं। आयुध निर्माणी बोर्ड (ओएफबी) के निगमीकरण के बाद 2021 में बनी इस कंपनी ने 2023-24 में 1,726 करोड़ रुपये के गोला-बारूद और विस्फोटक निर्यात किए। यह कंपनी गोला-बारूद से लेकर 155 मिमी के तोप के गोले तक एक्सपोर्ट करती है। 


मिलिट्री, मेंटेनेंस और ओवरहॉल का हब बनने की तैयारी

वहीं, अब अगला टारगेट अगले पांच सालों यानी 2028-29 तक 50,000 करोड़ रुपये के अपने महत्वाकांक्षी रक्षा निर्यात लक्ष्य को पाने का है। सूत्र ने बताया कि हमारा लक्ष्य अब अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया प्रशांत क्षेत्र के देश हैं। ये देश पश्चिमी देशों के मुकाबले सस्ते दामों पर बेहतर क्वॉलिटी वाले हथियार खरीदना चाहते हैं, और हम उनकी जरूरतों को पूरा करेंगे। इसके लिए सरकार ने कुछ देशों में डिफेंस अताशे की तैनाती की है, जो उन देशों की जरूरतों के मुताबिक रक्षा सौदों को अंजाम देने में अहम भूमिका निभाएंगे। भारत सरकार के इन प्रयासों को अमली जामा पहनाते हुए सी-295 जैसे मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एय़रक्राफ्ट और कॉमर्शियल हेलीकॉप्टरों के लिए प्राइवेट असेंबली प्लांट भी बनाए हैं, जो वैश्विक मांग को भी पूरा करने में सक्षम होंगे। भारत की अगली रणनीति MRO यानी मिलिट्री, मेंटेनेंस और ओवरहॉल का हब बनने की है। रक्षा मंत्रालय ने इस बढ़ोतरी को बनाए रखने और रफ्तार देने के लिए एक रोडमैप तैयार किया है। जिसमें निर्यात किए जाने वाले प्रोडक्ट्स की रेंज का विस्तार करने और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ सहयोग बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। 


2017 से भारत का रक्षा निर्यात 12 गुना से ज्यादा बढ़ा

22 जुलाई को लोकसभा में पेश आर्थिक सर्वेक्षण- 2023-24 में भारत की रक्षा निर्यात उपलब्धियों का विस्तृत विश्लेषण पेश किया गया है। सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत ने वित्त वर्ष 2023-24 में अपना अब तक का सबसे अधिक रक्षा निर्यात दर्ज किया, जो कुल 20,915 करोड़ रुपये था। जो वित्त वर्ष 2022-23 से 25 फीसदी ज्यादा है। सर्वेक्षण में कहा गया है, वित्त वर्ष 2017 से भारत का रक्षा निर्यात 12 गुना से अधिक बढ़ गया है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक इसका श्रेय डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को जाता है, जिसकी संख्या वित्त वर्ष 2023 में 1,414 से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में 1,507 हो गई है। वहीं निर्यात बढ़ने के साथ भारत के घरेलू रक्षा उत्पादन में भी पर्याप्त बढ़ोतरी दर्ज हुई है। रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024 में घरेलू उत्पादन लगभग 1.27 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष में 1.09 ट्रिलियन रुपये था, जिसमें 16.7 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज हुई है।
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