जापान में कोरोना महामारी के कारण बढ़ते आर्थिक संकट के बीच युनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) स्कीम लागू करने के मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। कोरोना महामारी से खड़े हुए आर्थिक संकट के कारण जापान में बड़ी संख्या में लोगों का रोजगार खतरे में है, जबकि आर्थिक गैर-बराबरी तेजी से बढ़ी है।
इसी के बीच प्रधानमंत्री योशिहिडे सुगा के एक प्रमुख आर्थिक सलाहकार ने यूबीआई लागू करने का सुझाव दिया है। यूबीआई की अवधारणा यह है कि इसके तहत एक निश्चित रकम देश के हर नागरिक को बिना किसी शर्त के दी जाए।
जापान में अतीत में विपक्षी पार्टियों ने ये वादा किया था कि सत्ता में आने पर वे कम आय वाले लोगों को एक निश्चित रकम देंगी, लेकिन ये पहला मौका है, जब इस योजना पर गंभीरता से बहस शुरू हुई है। इसकी वजह यह है कि ये प्रस्ताव प्रधानमंत्री सुगा की विकास रणनीति समिति के सदस्य हेइजो ताकेनाका ने दिया है।
पिछले साल दिए थे एक लाख येन
पिछले साल जापान सरकार ने कोरोना महामारी के कारण हर परिवार को एक लाख येन (960 डॉलर) की आर्थिक सहायता दी थी। इसका जनता में भारी स्वागत हुआ। उसी प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए ताकेनाका ने यूबीआई लागू करने का सुझाव दिया है।
हर माह 70 हजार येन दिए जाएं
ताकेनाका प्रधानमंत्री जुनिचिरो कोइजुमी के कार्यकाल में 2001 से 2006 तक मंत्री थे। उनका प्रस्ताव है कि यूबीआई के तहत हर नागरिक को हर महीने 70 हजार येन दिए जाएं। इसके लिए धन का इंतजाम पेंशन फंड और जन कल्याण बजट से किया जाए। यानी इन मदों में खर्च होने वाली रकम का दोबारा आवंटन किया जाए।
ताकेनाका ने जापानी समाचार एजेंसी क्योदो को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि ये योजना लागू हुई, तो इससे लोगों को सामाजिक सुरक्षा का बेहतरीन कवर मिलेगा। इससे लोगों में उद्यम भावना को प्रोत्साहन मिलेगा और उन लोगों को सहारा मिलेगा जिनकी नौकरी कारोबार को डिजिटल रूप दिए जाने के कारण चली गई है।
ताकेनाका का कहना है कि प्रति व्यक्ति 70 हजार येन की रकम से सरकार पर कोई बड़ा वित्तीय बोझ नहीं आएगा, क्योंकि इसके लिए कुछ धन दूसरी कल्याण योजनाओं को बंद करके जुटा लिया जाएगा। ताकेनाका का दावा है कि यूबीआई लागू होने के बाद उन कल्याण योजनाओं की जरूरत नहीं रह जाएगी।
संभावना व असर पर बहस शुरू
एक उच्च स्तरीय अधिकारी की तरफ से ये प्रस्ताव आने के बाद इसकी संभावना और असर को लेकर जापान में बहस छिड़ गई है। कियो यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने अखबार जापान टाइम्स से कहा कि इस योजना को चार से पांच वर्ष में शुरू किया जा सकता है। लेकिन जब तक कोरोना महामारी काबू में नहीं आती, इस पर गंभीर बहस की गुंजाइश नहीं है।
कोमाजावा यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर ओमोहीरो इनोउ ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का चलन बढ़ने के कारण नौकरियां डिजिटल क्षेत्र में जा रही हैं। साथ ही इससे गैर बराबरी बढ़ रही है। उसे देखते हुए यूबीआई लागू करना आगे चल कर अनिवार्य हो सकता है।
फिनलैंड और कनाडा में प्रयोग का मिला-जुला असर रहा
यूबीआई को लेकर फिनलैंड और कनाडा में प्रयोग किए गए थे, लेकिन उनका अनुभव मिला-जुला रहा। उधर स्विट्जरलैंड में इसे लागू करने के सवाल पर 2016 में जनमत संग्रह कराया गया था, लेकिन लगभग 77 फीसदी लोगों ने इसका विरोध किया। उसके बाद वहां ये योजना छोड़ दी गई। जापान में भी कई विशेषज्ञों का कहना है कि इस योजना को जनता का समर्थन नहीं मिलेगा।
मौजूदा योजनाओं में सुधार जरूरी
दाइवा इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च में अर्थशास्त्री केइजी कांडा ने जापान टाइम्स से कहा कि अगर सरकार यूबीआई लागू करना चाहती है, तो उसके लिए जरूरी यह है कि वह पेंशन और सामाजिक सुरक्षा की अभी लागू दूसरी योजनाओं में सुधार करे। ऐसे सुधार के बिना लोगों की सहमति पाना आसान नहीं होगा। कांडा के मुताबिक यूबीआई लागू करने के लिए टैक्स दरों में भारी बढ़ोतरी करनी होगी।
हर साल 100 खरब येन का खर्च आएगा
एक अनुमान के मुताबिक हर व्यक्ति को 70 हजार येन हर महीने देने के लिए सरकार को हर साल 100 खरब येन खर्च करने होंगे। यह जापान में सामाजिक सुरक्षा पर खर्च होने वाले कुल बजट का 80 फीसदी हिस्सा है। 2018 में जापान में पेंशन लाभ और अन्य जन कल्याण योजनाओं पर 121 खरब येन का खर्च आया था। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि गरीब लोगों के लिए 70 हजार येन की सहायता काफी नहीं है। उनके मुताबिक सरकार अगर कम आय वाले लोगों की मदद करना चाहती है, तो उसके सामने पहला कार्य सामाजिक सुरक्षा के तंत्र को मजबूत करने का होना चाहिए।