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VIDEO: अब एक नई तरह से फैल रहा कोरोना वायरस, क्या हवा में सांस लेना भी हो चुका घातक?

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
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अभी तक हम सिर्फ यही जानते थे कि सांस लेने से या छींकने से ही कोरोना वायरस एक शरीर से दूसरे शरीर तक फैलता है, लेकिन ताजा अध्यन की माने तो यह महामारी हवा के माध्यम से भी फैल सकती है। यानी अब आपको जिंदगी जीने के लिए जरूरी सांस भी संभलकर लेनी होगी, क्योंकि आपकी एक लापरवाही आपको कोरोना वायरस का शिकार बना सकती है।

संक्रमण के फैलने के पीछे अब वैज्ञानिकों ने एक और वजह भी ढूंढ़ ली है। अमेरिका में नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (एनएएस) के प्रमुख हार्वे फाइनबर्ग ने 1 अप्रैल को वाइट हाउस ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी के प्रमुख केल्विन ड्रोगेमीयर को पत्र लिखकर इसके बारे में आगाह किया है।

ये तो सभी को पता है कि मानव के बाल की तुलना में 900 गुने छोटे इस वायरस से संक्रमित व्यक्ति जब खांसता या छींकता है तो उसके मुंह या नाक से गिरी बूंदे आसपास खड़े व्यक्ति को भी संक्रमित कर देती है। ठोस सतह पर 9 दिन से ज्यादा जीवित रहने के अलावा ये वायरस गुरुत्वाकर्षण की वजह से ये 1 या 2 मीटर तक के वातावरण में भी जीवित रहते हैं, जिससे हमारी सुरक्षा अधिक कठिन हो जाती है।
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चीन के जिस वुहान शहर से इस बीमारी की शुरुआत हुई वहां के रिचर्सर युआन ली ने एक प्रयोग में पाया कि जब सफाईकर्मी संक्रमित फर्श और क्षेत्र को सैनिटाइज कर रहे होते हैं तो हवा के माध्यम से इस वायरस के फैलने की उम्मीद हो सकती है।

डेली मेल की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका की नेब्रास्का यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने जो स्टडी की, उसके मुताबिक मरीज के कमरे से जाने के बाद भी कमरे की हवा में वायरस की मौजूदगी हो सकती है। मरीज के जाने के कई घंटे बाद भी कमरे के वातावरण में काफी मात्रा में वायरस हो सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अस्पताल के जिस वार्ड में या कमरे में कोरोना के मरीज रह रहे हैं, उसके आसपास, कॉरिडोर वगैरह की हवा में भी वायरस हो सकते हैं।

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नई रिसर्च क्या कहती है?

जापान के राष्ट्रीय प्रसारण संगठन 'NHK' ने भी एक वीडियो के माध्यम से समझाया है कि कैसे कोरोना वायरस अब 'माइक्रो-ड्रॉपलेट' संक्रमण का रूप ले चुका है। वीडियो में, जैसे ही एक इंसान छींकता है, तो बूंदें हवा में कई सारी सूक्ष्म बूंदें छोड़ती हैं, जो एक दूसरे इंसान को संक्रमित करने के लिए काफी देर तक हवा में रहती हैं।
 

कैंब्रिज में एमआईटी के शोधकर्ताओं ने ये देखने के लिए एक हाई स्पीड कैमरा और अन्य सेंसर इस्तेमाल किया कि असल में किसी के खांसने या छींकने के बाद क्या होता है, इसमें उन्होंने पाया कि सांस लेने से गैस का एक धुआं पैदा होता है जिसकी गति बहुत तेज होती है, इस गैस में कुछ अलग-अलग आकार की बूंदें भी होती हैं। इनमें जो सबसे छोटी बूंदें होती हैं वो न सिर्फ सबसे ज्यादा दूर तक जाने की क्षमता रखती हैं बल्कि हवा में भी संक्रमण का खतरा बनाए रखती है।

मौजूदा निर्देश क्या है?

नई रिसर्च से मास्क पहनने के निर्देशों और सलाह में बदलाव आ सकता है। फिलहाल WHO उन्हीं लोगों को मास्क पहनने की सलाह देता है, जिन्हें या तो संक्रमण की आशंका हो या वो संक्रमित लोगों की देखभाल कर रहे हों।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक फिलहाल WHO उन्हीं लोगों को मास्क पहनने की सलाह देता है जिन्हें या तो संक्रमण की आशंका हो या वो संक्रमित लोगों की देखभाल कर रहे हों। विश्व स्वास्थ्य संगठन इस बात पर भी जोर देता है कि मास्क पहनने का फायदा तभी होगा जब इन्हें थोड़े समय में बदला जाए, ठीक से डिस्पोज किया जाए और बार-बार हाथ धोया जाए। ये सलाह उन साक्ष्यों पर आधारित है, जिनमें पाया गया है कि कोरोना वायरस नाक और मुंह के जरिए बाहर आने वाली बूंदों के जरिए फैलता है।

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