मानवाधिकारों में समाहित
सोमवार को जारी रिपोर्ट में सदस्य देशों से मानवाधिकार संधियों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत तय दायित्वों को निभाने का अनुरोध किया गया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति और ‘2013 रबात प्लान ऑफ एक्शन’ में नफरत और भेदभाव को उकसावा दिए जाने से रोकने के लिए राज्यसत्ता के दायित्वों को स्पष्ट किया गया है।
डेविड काए ने कहा कि कंपनियां मानवाधिकारों का सम्मान करने में अपनी जिम्मेदारियों को सही ढंग से नहीं निभा रही हैं जबकि उन्हीं के प्लेटफॉर्म पर नफरत प्रेरित संदेशों को बढ़ावा मिल रहा है।
ऑनलाइन हेट स्पीच से निपटने के लिए नए रोडमैप में रेखांकित किया गया है कि कंपनी की संस्कृति से मानवाधिकारों के पालन के श्रेष्ठ तरीकों को बाहर रखने के क्या प्रभाव हो सकते हैं।
“मानवाधिकार समुदाय ने सोशल मीडिया और इंटरनेट इकॉनॉमी की अन्य कंपनियों से लंबे समय से बातचीत की है। इसके बावजूद कंपनियां अडियल रुख अपनाकर ऐसी नीतियों को जारी रखे हैं जो बुनियादी मानवाधिकार कानून के तहत उनकी कार्रवाई को स्पष्ट रूप से सामने रखे।”
यह रिपोर्ट एक ऐसे समय में आई है जब सोशल मीडिया की बड़ी कंपनी फेसबुक पर झूठी न्यूज रिपोर्टों व गलत सूचनाओं के अलावा फैल रही हिंसक सामग्री को रोकने का दबाव डाला जा रहा है।
अपनी ताकत और प्रभाव को ना आंक पाने की कंपनियों की विफलता और जनहित के बजाए शेयरधारकों का ध्यान रखने का अंत तत्काल होना चाहिए। इस रिपोर्ट ने कंपनियों को रास्ता बदलने का एक जरिया दिया है।
स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं। ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतंत्र संस्था है। ये दरअसल परिषद की स्वतंत्र जांच निगरानी प्रणाली है जो किसी खास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है।
स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं, वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता है। ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं।