कोरोना वायरस इस सदी सबसे खतरनाक बीमारी सामने बनकर आई है। इस महामारी ने समाज के सामने आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां और खड़ी कर दी हैं जिसमें लॉकडाउन की वजह से कई देशों में अर्थव्यवस्थी की स्थिति चरमरा सी गई है।
27 अप्रैल को संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने एक शोध जारी किया जिसमें बताया गया कि महिलाएं परिवार नियोजन की सेवाएं लेने में असमर्थ हैं, अनचाहे तौर पर गर्भवती हो रही हैं और लिंग संबंधी हिंसा का शिकार हो रही हैं।
अगर ऐसी ही महामारी फैलती रही और इसको रोक पाना मुश्किल हुआ तो दुनिया में महिलाओं के अनचाहे गर्भ घारण करने के मामले बढ़ जाएंगे। एक तरफ दुनिया की सरकारें वायरस को फैलने से रोकने में व्यस्त हैं तो वहीं जरूरी प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी होने से दूसरा संकट पैदा हो रहा है।
114 कम और मिडिल आय वाले देशों में 4.7 करोड़ महिलाएं विकसित गर्भनिरोधक कराने की सुविधा नहीं है। अगर अगले छह महीने तक लॉकडाउन जारी रहा और मुख्य स्वास्थ्य सेवाएं बहाल नहीं हुईं तो दुनिया में 70 लाख महिलाओं के अनचाहे तरीके से गर्भवती होने की उम्मीद है।
यूनाइटेड नेशन सेक्सुएल और रिप्रोडक्टिव हेल्थ एजेंसी ने एवनीर हेल्थ, जॉन्स होप्किन्स यूनिवर्सिटी और विक्टोरिया यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर ये शोध किया। अगर लॉकडाउन जारी रहता है तो शोध के मुताबिक हर तीन महीने में 20 लाख महिलाएं गर्भनिरोधक नहीं करा पाएंगी।
शोध के मुताबिक लॉकडाउन का असर महिलाओं पर ज्यादा देखने को मिल रहा है। वायरस के फैलने के डर से महिलाएं अपने इलाज और चेकअप के लिए अस्पताल जाने से परहेज करेंगी। इसके अलावा गर्भनिरोधक दवाइयों के सप्लाई चेन पर असर से उपलब्धता भी सीमित हो जाएगी।
शोध में जारी किया डाटा बताता है कि कोविड-19 के विनाशकारी प्रभाव बहुत जल्द दुनिया के महिलाओं और लड़कियों पर दिखने लगेगा। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ नतालिया कनेम का कहना है कि इस महामारी से लाखों की संख्या में महिलाएं परिवार नियोजन नहीं कर पाएंगी, अपने स्वास्थ्य और शरीर की सुरक्षा नहीं कर पाएंगी।
डॉ कनेम का कहना है कि महिलाओं के प्रजनन संबंधी अधिकार और स्वास्थ्य को हमेशा प्राथमिकता मिलनी चाहिए। महिलाओं के लिए सेवाएं लगातार चलती रहनी चाहिए और सप्लाई होती रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जो महिला कमजोर है उसे सुरक्षा देनी चाहिए।