फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

कोरोना संकट: तीन अरब लोगों के पास नहीं है हाथ धोने का पानी! भारत तेरहवां

वर्ल्ड डेस्क, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Thu, 26 Mar 2020 08:07 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
coronavirus kit - फोटो : सांकेतिक

कोरोना वायरस ने इस समय पूरी दुनिया में हाहाकार मचा रखा है। वैश्विक माहमारी घोषित किए जाने के बाद से पूरी दुनिया में 21,200 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कोरोना संकट के अलावा पूरी दुनिया के कई देश एक और संकट से जूझ रहे हैं। जी हां, यह संकट है पानी की कमी का। आइए जानते हैं क्या है इसकी वजह और मायने...

बार-बार हाथ धोने की जरूरत

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोरोना वायरस के संकट के समय बार-बार हाथ धोने को सबसे जरूरी बुनियादी एहतियाती कदम बताया है। लेकिन दुनियाभर के कई देश पानी की कमी से जूझ रहे हैं। क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण में इसे वॉटर स्ट्रेस या जल तनाव कहा गया है।



क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण के मुताबिक, कोरोना के कहर से बुरी तरह प्रभावित ईरान वॉटर स्ट्रेस या जल तनाव के मामले में दुनिया में चौथे नंबर पर है। जबकि भारत इस मामले में 13वें स्थान पर है।

विज्ञापन

coronavirus kit - फोटो : सांकेतिक
कोरोना वायरस ने इस समय पूरी दुनिया में हाहाकार मचा रखा है। वैश्विक माहमारी घोषित किए जाने के बाद से पूरी दुनिया में 21,200 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कोरोना संकट के अलावा पूरी दुनिया के कई देश एक और संकट से जूझ रहे हैं। जी हां, यह संकट है पानी की कमी का। आइए जानते हैं क्या है इसकी वजह और मायने...

बार-बार हाथ धोने की जरूरत

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोरोना वायरस के संकट के समय बार-बार हाथ धोने को सबसे जरूरी बुनियादी एहतियाती कदम बताया है। लेकिन दुनियाभर के कई देश पानी की कमी से जूझ रहे हैं। क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण में इसे वॉटर स्ट्रेस या जल तनाव कहा गया है।

क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण के मुताबिक, कोरोना के कहर से बुरी तरह प्रभावित ईरान वॉटर स्ट्रेस या जल तनाव के मामले में दुनिया में चौथे नंबर पर है। जबकि भारत इस मामले में 13वें स्थान पर है।

हाथ धोने के पानी की कमी

कोविड-19 के संकट के बीच दुनियाभर में लगभग 300 करोड़ लोग पानी से हाथ धोने की बुनियादी सुविधा के लिए जूझ रहे हैं। जबकि इनमें से करीब 2.2 सौ करोड़ और 4.2 सौ करोड़ लोगों तक क्रमशः पानी और स्वच्छता सेवाओं की पहुंच नहीं है।

वर्ष 2019 के जो आंकड़े आए हैं, उनके हिसाब से 17 देश पानी की कमी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इनमें से 12 देश मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के हैं। भारत इनमें 13वें स्थान पर है। हालांकि आबादी के घनत्व के हिसाब से उसकी आबादी बाकी 12 देशों के मुकाबले लगभग 2 से 3 गुना ज्यादा है।

क्या है पानी की कमी का खतरा

दुनियाभर के 17 देश जल तनाव का सामना कर रहे हैं। पूरी दुनिया की आबादी का एक चौथाई हिस्सा इन देशों में ही रहता है। अब तक कोरोना से दुनियाभर में 21 हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं। यह मामले ज्यादातर यूरोप और चीन के हैं। लेकिन यह वॉटर स्ट्रेस (जल की कमी) वाले देशों में भी अपने पैर तेजी से पसार रहा है।

रोज बढ़ती संख्या इस बात की गवाही दे रही है। बीती 19 मार्च तक ही ईरान में 18,407 मामले दर्ज किए गए थे। ईरान वह चौथा देश है जो सबसे ज्यादा वाटर स्ट्रेस्ड यानी जल की कमी झेल रहा है। वहीं इस्राइल इस मामले में दूसरे नंबर पर है।

कैसे है पानी की कमी का खतरा

40 फीसदी थर्मल पावर प्लांट यानी ऐसे प्लांट जो जीवाश्म ईंधन, बायोमास, परमाणु या केंद्रित सौर से बिजली पैदा करते हैं, अत्यधिक पानी वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। भारत के जल-तनाव वाले क्षेत्रों में कोयला बिजली संयंत्र लाखों घनमीटर जल का उपयोग करते हैं।

कोरोना वायरस की बाहरी दीवार वसायुक्त है। इस कारण साबुन से हाथ धोना ही सबसे अच्छा विकल्प माना जा रहा है। इसलिए इसमें पानी की जरूरत पड़ेगी ही।  

दुनिया की 80 फीसदी आबादी प्रभावित
पानी की कमी के किसी ना किसी स्तर का दुनिया की करीब 80 प्रतिशत आबादी पहले से ही सामना कर रही है। इस कारण यह आबादी वैश्विक महामारी बन चुके कोविड-19 का सामना करने के लिए बेहद असुरक्षित है, क्योंकि वह इस वायरस से निपटने के लिए हाथ बार-बार धोने जैसे बुनियादी सुरक्षा उपायों को अपनाने के लिए भी जद्दोजहद कर रही है।

78 करोड़ लोगों के पास पीने के पानी नहीं

रिपोर्ट के अनुसार भारत, ब्राजील, फिलीपींस, दक्षिण अफ्रीका, केन्या और अफ्रीका के कई अन्य देशों में खास तौर पर बस्तियों में रहने वाले लोगों के पास हाथ धोने का पानी नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां और अन्य मानवीय संगठन शरणार्थियों और आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों को लेकर भी चिंतित हैं। करीब 3 अरब लोगों के पास हाथ धोने की बुनियादी सुविधा नहीं है। जबकि 78.5 करोड़ लोगों की पीने के पानी तक पहुंच नहीं है। वहीं 20 लाख लोग मल से दूषित पानी पीने काे मजबूर हैं।

रोज 17 लीटर तक की जरूरत

डब्ल्यूएचओ के अनुसार एक व्यक्ति को अपने सभी जरूरी कामों के लिए रोज करीब 7.5 से 17 लीटर पानी की जरूरत होती है। यह जरूरत अभी कोरोना संकट के समय में और बढ़ गई है, क्योंकि पानी कई सेवाओं और विशेष रूप से स्वास्थ्य देखभाल के लिए आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन पानी का संकट भविष्य में भी बढ़ाता रहेगा, क्योंकि तापमान बढ़ने के साथ सूखे की स्थिति बनेगी। 

जो कि मरुस्थलीकरण का कारण बनता है और धरती के जमे हुए क्षेत्रों को पिघलाता है जो मीठे पानी के महत्वपूर्ण भंडार हैं। यह आगे चलकर कोविड-19 जैसी बीमारी के प्रकोप से निपटने के लिए हमारे लचीलेपन को कम करेगा। 

मरुस्थलीकरण के कई कारण हैं जिनमें मानव गतिविधि और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं। अनुमान है कि मरुस्थलीकरण का सीधा प्रभाव 25 करोड़ लोगों पर पड़ रहा है। 1 अरब लोग अप्रत्यक्ष रूप से और 3 अरब हेक्टेयर सूखे इलाकों में क्षय की स्थिति से गुजर रहे हैं।

एशिया और अफ्रीका सबसे ज्यादा प्रभावित

इस सदी के अंत तक 70 करोड़ लोगों के शुष्क क्षेत्रों में रहने का अनुमान है। इसके मुताबिक सूखा वाले क्षेत्रों में सबसे अधिक आबादी एशिया और अफ्रीका में होगी। संयुक्त राष्ट्र भी सूखे के प्रभाव को देख रहा है।

अनुमान ये भी हैं..
साल 2025 तक दुनिया की आधी आबादी वॉटर स्ट्रेस वाले क्षेत्रों में रहने लगेगी। साल 1980 के बाद से पानी की वैश्विक मांग 1 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। सबसे कम विकसित देशों में करीब 22 फीसदी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में जल सेवा शामिल नहीं है। हिंदकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर 8.6 करोड़ भारतीयों सहित करीब 24 करोड़ लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण जल आपूर्ति का स्रोत हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next