मौजूदा लहर कमजोर पड़ने के बाद संक्रमण सर्दियों में बड़ी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। फिर यह तेजी से नीचे आएगा और इसके बाद दो साल तक महामारी छोटी-छोटी लहरों में आती रहेगी। इसे फॉल पीक मॉडल कहते हैं। यह स्थिति 1918-19 में आए स्पैनिश फ्लू महामारी जैसी होगी।
धीमी लहर...
मार्च से मई तक शीर्ष पर पहुंचने के बाद महामारी बिना उतार-चढ़ाव के 2022 तक बहुत मंथर गति से जारी रहेगी। इन संभावनाओं के मद्देनजर विशेषज्ञों का कहना है कि हमें अगले 18-24 माह के लिए कोविड संक्रमण के लिए तैयार रहना चाहिए। इस दौरान विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में हॉट-स्पॉट सामने आते रहेंगे।
दूसरे अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कहा है कि आमतौर पर प्रति दस हजार लोगों में 35 मामले सामने आने पर सामाजिक दूरी अपनाई जाने लगती है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर इसका पैमाना अलग हो सकता है।
इसके बाद, प्रति दस हजार पांच मामले रह जाने पर सामाजिक दूरी में ढिलाई दी जाती है। वहीं, हर्ड इम्युनिटी का पैमाना 55 फीसदी आबादी में प्रतिरक्षा को माना जाता है।
महामारी के प्रसार में एक अन्य बड़ा कारक मौसम है। शोधकर्ताओं का कहना है कि गर्म दिनों में वायरस धीमा हो जाता है।हालांकि, इस साल वायरस की अतिसक्रियता के कारण गर्मी में भी बड़ी आबादी जोखिम में रहेगी।
सतर्कता के साथ रियायत
एक दूसरे मॉडल के अनुसार, शोधकर्ताओं ने क्रिटिकल केयर क्षमता को दोगुना करने पर जोर दिया है ताकि सामाजिक दूरी के पैमानों में ढील दी जा सके। उनका कहना है कि इससे प्रति दस हजार 70 लोगों में संक्रमण होने पर सामाजिक दूरी अपनाई जा सकती है।
कुल मिलाकर शोधकर्ताओं ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि महामारी नियंत्रित करने के लिए सामाजिक दूरी का एक चरण पर्याप्त नहीं होगा। इसे हटाने के फौरन बाद ज्यादा लोग संक्रमण के जोखिम में रहेंगे। हर्ड इम्युनिटी बनने में भी काफी वक्त लगेगा। लिहाजा, वैक्सीन नहीं आई तो 2021-22 तक यह महामारी बनी रह सकती है।
मौसम और महामारी भविष्यवाणी में समानता
विशेषज्ञों के अनुसार, मौसम भविष्यवाणी और महामारी मॉडलिंग में समानता है। दोनों को ही साधारण गणितीय व्याख्या से समझा जाता है। मौसम के मामले में यह व्याख्या फिजिक्स और कैमेस्ट्री आधारित होती है।
वहीं, संक्रामक रोगों की मॉडलिंग वायरस और महामारी विज्ञान के आधार पर की जाती है। जाहिर तौर पर इंसान मौसम को तो नहीं बदल सकता। लेकिन अपने व्यवहार, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों के बीच संतुलन से महामारी का भविष्य बदला जा सकता है।