जिस अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया गया, वह घर से महज तीन किमी. की दूरी पर ही था, लेकिन आखिरी पलों में एकदम अकेली रहीं। बेटी और पति उन्हें आखिरी बार देख तक नहीं पाए। इसका पूरे परिवार को अफसोस है।
बेटी से कहे वो आखिरी शब्द..
माधवी की मौत से तीन दिन पहले ही मिनोली ने उन्हें बताया था, ‘मम्मी इन दिनों कॉलेज बहुत तनावपूर्ण हो रहा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि मैं घर आ गई हूं। माधवी ने जवाब दिया, ‘बेटा, ध्यान केंद्रित करो।’ बेटी ने कहा, ‘वही कर रही हूं मम्मी, लेकिन आप जल्दी आ जाओ। मैं तहेदिल से आपको बहुत प्यार करती हूं मम्मी।
बस, यही वो आखिरी शब्द थे जो माधवी ने कहे थे। चंद घंटों बाद वे परिवार से बहुत दूर चली गईं।
वह हमारे लिए खड़ी रहीं, लेकिन हम नहीं...
वह हमेशा हमारे लिए खड़ी रहीं। लेकिन जब खुद बीमार पड़ीं तो हममें से कोई उनके पास नहीं खड़ा था।’ यह कहते-कहते माधवी के पति की आंखें भर आईं। उनके सहकर्मियों का कहना है, ‘माधवी का जाना हमारे लिए एक बड़ा झटका है।
मां से सुनना चाहती थी, सब ठीक हो जाएगा...
मिनोली कहती हैं, मुझे अब भी भरोसा नहीं हो रहा कि मेरी मां नहीं रहीं। मिनोली वैसे तो खुद डॉक्टर बनना चाहती हैं, लेकिन आज वह उस स्वास्थ्य तंत्र पर बेहद नाराज हैं, जो अपने चिकित्साकर्मियों को ही नहीं बचा सकता। अपनी मां के घर न लौट पाने का गम मिनोली को बहुत परेशान किए हुए है। वह कहती है, ‘मैं एक बार मेरी मां को गले लगकर उनसे सुनना चाहती थी कि सब ठीक हो जाएगा।’
एक सहकर्मी ने बताया कि मरीजों का ध्यान रखने के दौरान माधवी जब संक्रमित हुईं, तब तक कर्मियों को सुरक्षा उपकरण पहनने के निर्देश नहीं मिले थे। जब सक्रमितों की बाढ़ आने लगी और बिना लक्षण वाले लोग भी पॉजिटिव पाए जाने लगे, तब अस्पतालों को लगा कि बड़ी तादाद में मरीजों से घिरने पर स्टाफ भी संक्रमित हो सकता है।
परिवार पर दोहरी मार...
राज को मिनोली की यह हालत देखकर चिंता सताने लगी है। उन्होंने इस बारे में डॉक्टरों से भी परामर्श लिया है। लेकिन अब परिवार के सामने आर्थिक तंगी भी बड़ी दिक्कत है क्योंकि घर माधवी की कमाई से ही चल रहा था।