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'कोरोना': सूर्य का वायुमंडल फोटोस्फेयर से 100 गुना ज्यादा गर्म, क्यों है ऐसा, जानिए वैज्ञानिकों से

Tue, 25 May 2021 08:27 PM IST
सुरेंद्र जोशी वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन

सार

सूर्य के फोटोस्फेयर का तापमान करीब 6,000 डिग्री सेल्सियस रहता है, जबकि सौर वायुमंडल, इसे कोरोना भी कहा जाता है, वह इससे 100 गुना गर्म है। यानी वहां का तापमान लाखों डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Twitter
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विस्तार
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सूर्य की नजर आने वाली सतह, जिसे फोटोस्फेयर कहते हैं वहां तापमान करीब 6,000 डिग्री सेल्सियस रहता है। इससे कुछ हजार किलोमीटर ऊपर सौर वायुमंडल है। इसे कोरोना भी कहा जाता है, वह 100 गुना गर्म है। वहां का तापमान लाखों डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक है।

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सूर्य के मुख्य ऊर्जा स्रोत से अधिक दूरी होने के बावजूद, तापमान में यह वृद्धि अधिकतर सितारों में देखी जाती है और यह उस मौलिक पहेली को दर्शाता है जिस पर खगोल भौतिकीविदों ने दशकों तक विचार किया है। स्वीडन के वैज्ञानिक हेन्स एल्फवेन ने 1942 में एक व्याख्या प्रस्तावित की थी। उन्होंने सिद्धांत दिया था कि प्लाज्मा की चुंबकीय तरंगें सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र के आस-पास बड़ी मात्रा में ऊर्जा को उसके आंतरिक हिस्से से कोरोना तक ले जाती हैं, फोटोस्फेयर को दरकिनार कर यह ताप सूर्य के ऊपरी वायुमंडल में फैलता है।

इस सिद्धांत को अस्थायी तौर पर स्वीकार किया गया था, लेकिन इसके साक्ष्यों की जरूरत थी कि ऐसी तरंगों का अस्तित्व है। हमारे हालिया अध्ययन में अंतत: ये साक्ष्य मिले जो अल्फवेन के 80 साल पुराने सिद्धांतों को प्रमाणित करते हैं और पृथ्वी पर इस उच्च ऊर्जा घटना को काम में लाने के लिए एक कदम और करीब लाते हैं।
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कोरोना की ताप समस्या का 1930 के दशक के अंत में पता लग गया था। स्वीडन के स्पेक्ट्रोस्कोपिस्ट बेंग्ट एडलेन और जर्मनी के खगोल भौतिकविद वाल्टर ग्रोटियान ने पहली बार सूर्य के कोरोना में इस घटना का अवलोकन किया, जो केवल तभी हो सकती है जब उसका तापमान लाखों डिग्री सेल्सियस के आस-पास हो। यह कोरोना के निचली सतह से 1,000 गुणा ज्यादा अधिक गर्म तापमान को दिखाता है। फोटोस्फेयर सूर्य की वह सतह है जो हम धरती से देख सकते हैं। सूर्य की सतहों पर तापमान में इतना अधिक अंतर वैज्ञानिक समुदाय के लिए एक पहेली जैसा रहा है।

इस अंतर की व्याख्या के लिए वैज्ञानिकों ने सूर्य की प्रकृति एवं विशेषताओं को समझने की कोशिश की है। सूर्य लगभग पूरी तरह प्लाज्मा का बना हुआ है, जो इलेक्ट्रिकल चार्ज ले जाने वाली अत्यधिक आयनित गैस होती है। सूर्य के आंतरिक भाग के ऊपरी हिस्से कन्वेक्शन जोन में प्लाज्मा की यह गतिविधि बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिकल करंट और मजबूत चुंबकीय क्षेत्र पैदा करती है। इन चुंबकीय क्षेत्रों को फिर कन्वेक्शन द्वारा सूर्य के आंतरिक हिस्से से खींच कर उसकी नजर आने वाली सतह पर स्याह धब्बों (सनस्पॉट) के रूप में छोड़ दिया जाता है, जो चुंबकीय क्षेत्रों के समूह हैं, जो सौर वातावरण में कई प्रकार के चुंबकीय ढांचे बनाते हैं।

एल्फवेन ने कहा था कि सूर्य के चुंबकीय प्लाज्मा के भीतर विद्युत रूप से आवेशित कणों की भारी भरकम गतिविधियां चुंबकीय क्षेत्र में व्यवधान डालती हैं, जिससे ऐसी तरंगें पैदा होती हैं, जो बड़ी दूरियों के साथ-साथ बड़ी मात्रा में ऊर्जा को सूर्य की सतह से उसके ऊपरी वायुमंडल तक ले जाती हैं। यह ताप सौर चुंबकीय प्रवाह ट्यूब के साथ-साथ चलता है और कोरोना में जाकर विस्फोटित हो जाता है, जिससे उच्च तापमान पैदा होता है।

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