भारत ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए विकासशील देशों को हर साल 100 अरब डॉलर से ज्यादा की वित्तीय मदद की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन कॉप27 में भारत ने इस बात पर भी जोर दिया कि संसाधनों को जुटाने में अमीर देशों को आगे बढ़कर काम करना चाहिए।
वर्ष 2009 में कोपेनहेगन में कॉप15 में विकसित देशों ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में विकासशील देशों की मदद के लिए संयुक्त रूप से 2020 तक हर साल 100 अरब डॉलर जुटाने की प्रतिबद्धता जताई थी। परंतु, अमीर देश लगातार अपने इस वादे को पूरा करने में विफल रहे हैं।
भारत समेत विकासशील देश 2024 तक अमीर देशों पर एक नए वैश्विक जलवायु वित्त लक्ष्य पर सहमत होने के लिए दबाव डाल रहे हैं। इसे जलवायु वित्त पर नया सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य (एनसीक्यूजी) के नाम से भी जाना जाता है। विकासशील देशों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने और नए उपायों को अपनाने की लागत बढ़ गई है, इसलिए वित्तीय मदद खरबों में होनी चाहिए।
कॉप27 में बुधवार को एनसीक्यूजी पर एक उच्च स्तरीय मंत्रिस्तरीय बैठक हुई। सूत्रों के मुताबिक, इसमें भारत ने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया कि एनडीसी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जरूरी बदलाव हेतु विकसित देशों की तरफ से वित्तीय, तकनीकी और क्षमता निर्माण में ज्यादा समर्थन की जरूरत है।
वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था दीर्घकालिक हो
बैठक में भारतीय प्रतिनिधि ने यह भी कहा कि विकासशील देशों की मदद के लिए वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था दीर्घकालिक, रियायती और जलवायु विशिष्ट होनी चाहिए। इसका आवंटन भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने और नए उपायों को अपनाने के बीच समान होना चाहिए। भारत ने यह भी कहा कि 2009 में निर्धारित 100 अरब डॉलर का लक्ष्य तो पहले से ही कम था और उसे पूरा भी नहीं किया जा सका।
किसी भी साल 100 अरब डॉलर नहीं जुटा पाए अमीर देश
अमीर देशों के अंतर सरकारी निकाय आर्थिक सहयोग व विकास संगठन (ओईसीडी) के आंकड़ों के अनुसार विकसित देश विकासशील देशों की मदद के लिए वादे के मुताबिक किसी भी साल 100 अरब डॉलर का फंड नहीं जुटा सके। विकसित देशों ने 2013 में 52.5 अरब डॉलर जुटाए थे। यह 2015 में गिरकर 44.6 अरब डॉलर पर आ गया था। 2019 में इनकी तरफ से 80.4 अरब डॉलर का फंड संग्रह किया, जो 2020 में यह बढ़कर 83.3 अरब डॉलर हो गया।
2030 तक हर साल 6 से 11 खरब डॉलर की आवश्यकता
वित्त मामलों पर स्थायी समिति के अनुमानों के मुताबिक विकासशील देशों ने अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) व अन्य प्रतिबद्धताओं के तहत जो लक्ष्य तय किए हैं, उसके लिए 2030 तक उन्हें हर साल 6 खरब डॉलर से लेकर 11 खरब डॉलर की जरूरत होगी। एनडीसी वैश्विक तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे, विशेषरूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की राष्ट्रीय योजना है।
यूक्रेन युद्ध से प्राकृतिक गैस में तेजी से जलवायु लक्ष्य को खतरा
यूक्रेन युद्ध के चलते प्राकृतिक गैसों में आई तेजी ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लक्ष्यों को खतरे में डाल दिया है। मिस्र के इस तटवर्ती शहर में चल रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन कॉप27 में बृहस्पतिवार को क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि यूक्रेन पर रूस के हमले से पैदा ऊर्जा संकट से तरल और प्राकृतिक गैसों के उत्खनन में आई तेजी से 2030 तक हर साल हवा में करीब दो अरब टन कार्बन डाईऑक्सइड की मात्रा बढ़ेगी। जलवायु वैज्ञानिक बिल हरे के मुताबिक, इससे तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के प्रयासों को झटका लगेगा। एजेंसी
यूएन परमाणु प्रमुख ने कहा, रेडियोधर्मी कचरे की रीसाइक्लिंग ‘कठिन’ तकनीक
कॉप27 में संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के महानिदेशक राफेल ग्रॉसिक ने कहा कि रेडियोधर्मी (रेडियोएक्टिव) कचरे की रीसाइक्लिंग (पुनर्चक्रण) एक कठिन तकनीक है। सुरक्षा के लिहाज से भी यह चनौतीपूर्ण होने के साथ ही ज्यादा लागत वाली भी है। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद अमेरिका इसे अपनाता है तो एजेंसी उसकी प्रक्रिया पर निगरानी रखने में सक्षम होगी। जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के मकसद से अमेरिका परमाणु ऊर्जा को विस्तार देने की तैयारी में है। अमेरिका घरेलू परमाणु ईंधन आपूर्ति और कचरे में कटौती के लिए रीसाइक्लिंग को एक बेहतर तरीका मानता है।