अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के एक खेमे में ये राय बन रही है कि चुनाव नतीजे को स्वीकार ना करने की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति देश के लिए हानिकारक है। इस खेमे में यह राय भी बनी है कि अपने तमाम दावों के बावजूद ट्रंप खेमे के पास इस बात के सबूत नहीं हैं कि राष्ट्रपति को धांधली करके हराया गया।
ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सीनेटर चक ग्रेसले ने सीएनएन चैनल से बातचीत में कहा कि ह्वाइट हाउस को तमाम प्रशासनिक जानकारियां अब नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ साझा करनी चाहिए। अमेरिका में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया के दौरान निर्वाचित-राष्ट्रपति को ऐसी तमाम जानकारियां देने की परंपरा है। लेकिन ट्रंप प्रशासन सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू करने से लगातार इनकार कर रहा है।
एक अन्य सीनेटर शेली मूर कैपिटो से जब इसी चैनल पर पूछा गया कि क्या वे जो बाइडन को निर्वाचित राष्ट्रपति मानती हैं, तो उन्होंने कहा- निश्चित रूप से। गौरतलब है कि ट्रंप समर्थक नेता बाइडन को अब तक निर्वाचित राष्ट्रपति मानने से इनकार कर रहे हैं।
लेकिन अमेरिकी मीडिया के मुताबिक रिपब्लिकन पार्टी में राष्ट्रपति ट्रंप से अलग स्टैंड लेने वाले नेता अब भी कम ही हैं। ज्यादातर नेता अलग- अलग राज्यों में दायर चुनावी याचिकाओं का समर्थन कर रहे हैं। उनके बीच से ये सुझाव भी दिया जाने लगा है कि अगर तय समय सीमा के अंदर इन याचिकाओं का निपटारा नहीं हुआ, तो संबंधित राज्य की विधायिका को अपने यहां से इलेक्ट्रोरल कॉलेज के सदस्य नियुक्त कर देने चाहिए। जिन राज्यों से बाइडन जीते हैं, उनमें कई की विधायिका में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है।
अमेरिकी चुनाव प्रक्रिया के मुताबिक राज्य की विधायिका को ऐसा करने का अधिकार है। अमेरिका में इलेक्ट्रोरल कॉलेज की बैठक 14 दिसंबर को होती है, जिसमें राष्ट्रपति का औपचारिक रूप से चुनाव होता है। कायदे के मुताबिक 8 दिसंबर तक इलेक्ट्रोरल कॉलेज के सदस्यों की अंतिम सूची को प्रमाणित कर देना अनिवार्य है। अगर किसी वजह से इलेक्ट्रोरल कॉलेज के निर्वाचित सदस्यों पर विवाद बना रहे, तो राज्य की विधायिका उसके लिए सदस्य मनोनीत कर सकती है।
बाइडेन की डेमोक्रेटिक पार्टी का एक धड़ा ऐसी संभावना को लेकर चिंतित है। इस सिलसिले में बार साल 2000 के चुनाव का जिक्र किया जा रहा है, जब फ्लोरिडा राज्य में मतगणना को लेकर विवाद लंबे समय तक बना रहा। तब बिना मतदान प्रक्रिया पूरी हुए ही राज्य से इलेक्ट्रोरल कॉलेज के सदस्य तय किए गए और उन पर सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगा दी। डेमोक्रेटिक पार्टी के इस धड़े का कहना है कि फिर वैसा होने की संभावना से बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि राष्ट्रपति, उनके बेटे, ट्रंप के तमाम निकट सहयोगी और रिपब्लिकन पार्टी के ज्यादातर नेता चुनावी नतीजे को उलझाने की कोशिश में जी-जान से लगे हुए हैं।
अटार्नी जनरल विलियम बार ने कुछ रोज पहले एक मेमो जारी किया, जिसके तहत उन्होंने सरकारी अधिवक्ताओं को चुनावी याचिकाओं की पैरवी करने के लिए अधिकृत कर दिया। इसे प्रशासन की निष्पक्षता के खिलाफ माना गया है, लेकिन इससे ट्रंप खेमे को बड़ी ताकत मिल गई है। पेंसिल्वेनिया, जॉर्जिया, विस्कोंसिन, मिशिगन और एरिजोना राज्यों में ऐसी याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं, जिनमें दावा किया गया है कि चुनाव में धोखाधड़ी हुई।
ट्रंप खेमे ने ऐसा जोरदार प्रचार अभियान भी छेड़ रखा है। जानकारों का कहना है कि इसके जरिए ट्रंप चुनाव को लेकर अपने समर्थकों के मन में शक को गहरा बना रहे हैं, ताकि अगर राज्यों की विधायिका या न्यायपालिका से नतीजों को पलटा गया तो उसके लिए बड़ा जन समर्थन भी जुटाया जा सके।
जाने-माने राजनीतिक टीकाकार डेविड सिरोटा ने एक लेख में कहा है कि ट्रंप खेमे की कोशिश को एक इमरजेंसी के रूप में देखा जाना चाहिए। इसे हलके से लेना घातक होगा, क्योंकि साल 2000 में फ्लोरिडा राज्य में जो हुआ था, उसके इस बार कहीं बड़े पैमाने पर दोहराए जाने की वास्तविक आशंका है।