जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल के पसंदीदा उत्तराधिकारी को अगले आम चुनाव सत्ताधारी गठबंधन का चेहरा बनाने पर आखिरकार आम सहमति बन गई है। इस गठबंधन में शामिल पार्टी- क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू) के नेता मार्कस सोडर ने दस दिन की खींचतान के बाद अपना नाम वापस ले लिया। इससे ये तय हो गया कि सितंबर में होने वाल आम चुनाव में अर्मिन लैशेट ही क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) के नेतृत्व वाले गठबंधन के नेता होंगे। लेकिन जानकारों का कहना है कि इसके बावजूद मर्केल चैन की सांस लेने की स्थिति में नहीं हैं। उनकी विरासत के लिए खतरा अभी भी कम नहीं हुआ है।
सत्ताधारी गठबंधन में नेतृत्व का विवाद खत्म होने के बाद आए एक जनमत सर्वेक्षण के मुताबिक सीडीयू- सीएसयू गठबंधन फिलहाल लोकप्रियता में ग्रीन पार्टी से पिछड़ गया है। ऐसा पहली बार हुआ है। इस सर्वे के मुताबिक 14 अप्रैल के बाद सीडीयू-सीएसयू के लिए समर्थन में छह अंकों की गिरावट आई है। वह फिलहाल 21 फीसदी मतदाताओं की पसंद है, जबकि 2017 के चुनाव में जब ये गठबंधन जीता था, तब उसे 32 फीसदी वोट मिले थे। दूसरी तरफ ग्रीन पार्टी अभी 28 फीसदी मतदाताओं की पसंद है, जबकि 2017 के चुनाव में उसे सिर्फ 8.9 फीसदी वोट मिले थे।
जर्मनी इस समय कोरोना वायरस महामारी की नई लहर झेल रहा है। इस बार ये लहर कोरोना वायरस के ब्रिटिश वैरिएंट की वजह से आई है। कोरोना संक्रमण से मरने वालों की संख्या इस सोमवार को 80 हजार से ज्यादा हो गई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस समय देश के लगभग सभी आईसीयू वार्ड मरीजों से भरे हुए हैं। हालात को देखते हुए जर्मन सरकार देश में सख्त लॉकडाउन लागू करने पर विचार कर रही है। मेन्ज यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर केई अर्जाइमर ने एक अमेरिकी टीवी चैनल से कहा- ‘जर्मनी खुद अपनी शुरुआती सफलता का शिकार हो गया है। पहले दौर में जर्मन सरकार की प्रतिक्रिया निर्णायक, प्रभावी, विज्ञान सम्मत और सफल रही। इससे देश में लापरवाही का भाव आ गया। राजनेता दोबारा लॉकडाउन लगाने को लेकर अनिच्छुक हो गए हैं।’
अब इसे लेकर एंजेला मर्केल की कड़ी आलोचना हो रही है। सत्ताधारी गठबंधन की लोकप्रियता में आ रही गिरावट के पीछे मौजूदा कोरोना संकट को एक बड़ा कारण समझा गया है। अब एंजेला मर्केल को अनिर्णय का शिकार नेता कहा जा रहा है। गौरतलब है कि बीते मार्चे में ईस्टर के मौके पर लॉकडाउन लगाने का फैसला करने के बाद एंजेला मर्केल ने उसे वापस ले लिया था। उसके बाद देश में कोरोना के मामले बढ़ने लगे। अब इसकी कीमत मर्केल और उनकी पार्टी को चुकानी पड़ रही है। इसका फायदा ग्रीन पार्टी को मिल रहा है, जो पिछले चार साल में देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी बन कर उभरी है।
जानकारों के मुताबिक अपने 40 साल के इतिहास में ग्रीन पार्टी पहली बार इस मुकाम पर पहुंची है, जब वह चुनाव के बाद देश की सबसे मजबूत पार्टी बनने की स्थिति में हो। चुनाव सर्वेक्षणों के मुताबिक सितंबर के चुनाव में वह बुंडेस्टैग (संसद) में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभर सकती है। उसके बाद इस बात की संभावना बढ़ जाएगी कि उसकी नेता ही देश का अगला चांसलर बनें। पार्टी की नेता अनालेना बायेरबॉक की लोकप्रियता हाल में तेजी से बढ़ी है। लोकप्रियता के मामले में वे अर्मिन लैशेट से बहुत आगे हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर मौजूदा रुझान जारी रहे, तो 16 साल से चांसलर पद पर मौजूद एंजेला मर्केल की विदाई अप्रिय स्थितियों में होगी। जानकारों के मुताबिक अपने इस हश्र से मर्केल तभी बच सकती हैं, अगर बचे महीनों में उनकी सरकार कोरोना महामारी पर कारगर ढंग से काबू पा सके। फिलहाल, इसकी गुंजाइश कम नजर आ रही है।