फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

यूरोप में ऊर्जा चार्टर संधि को नया रूप देने पर खड़ा हुआ गहरा टकराव, जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कई देशों ने दी अलग होने की धमकी

Wed, 17 Feb 2021 02:23 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स

सार

ऊर्जा घोषणापत्र संधि (एनर्जी चार्टर ट्रीटी) 1994 में हुई थी। इसका मकसद ऊर्जा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है। इसमें एक निवेश संरक्षण प्रावधान शामिल है, जिसका मकसद कंपनियों को सरकारों के मनमाने फैसलों से बचाना है...
विज्ञापन
यूरोपीय संघ - फोटो : pixabay
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

यूरोपियन यूनियन (ईयू) में एक अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संधि को नया रूप देने के मुद्दे पर गहरा टकराव पैदा हो गया है। कई देशों को अंदेशा है कि अगर संधि को ये रूप दिया गया, तो उनके यहां ऊर्जा स्रोत के रूप में कोयला को छोड़ने और ग्रीन स्रोत को अपनाने के लिए मुकदमों की झड़ी लग जाएगी। इसलिए वे इसमें देर करना चाहते हैं। लेकिन पश्चिमी यूरोप के कई देश ये काम इस साल के अंत तक पूरा करने पर जोर दे रहे हैं।

विज्ञापन


ऊर्जा घोषणापत्र संधि (एनर्जी चार्टर ट्रीटी) 1994 में हुई थी। इसका मकसद ऊर्जा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है। इसमें एक निवेश संरक्षण प्रावधान शामिल है, जिसका मकसद कंपनियों को सरकारों के मनमाने फैसलों से बचाना है। अब विवाद इसी प्रावधान को बदलने के मुद्दे पर खड़ा हुआ है।

यूरोपीय आयोग अब इस संधि को आज की जरूरतों के मुताबिक ढालने की कोशिश कर रहा है। आयोग की देखरेख में अगले दो से पांच मार्च तक इस मुद्दे पर विभिन्न देशों के बीच बातचीत होगी। इस मामले में अपना रुख (पोजिशन पेपर) आयोग ने बीते सोमवार को जारी किया। इस संधि पर 55 देशों ने दस्तखत किए थे। अब उनमें से कुछ ने मांग की है कि संधि को नया रूप देने पर बातचीत की अवधि तीन दिन ना रखी जाए। बल्कि इसके लिए ज्यादा समय दिया जाए। जबकि दूसरी तरफ कुछ देशों ने चेतावनी दी है कि अगर संधि को इस साल के अंत तक नया रूप नहीं दिया गया, तो वे अपने को इससे अलग कर लेंगे।
विज्ञापन


स्पेन ने दो टूक कहा है कि अगर संधि को ईयू के जलवायु परिवर्तन रोकने की योजना के मुताबिक नहीं ढाला गया, तो वह खुद को इस संधि से अलग कर लेगा। वेबसाइट पोलिटिको.ईयू के मुताबिक स्पेन की उप प्रधानमंत्री टेरेसा रिबेरा और वहां को दो अन्य मंत्रियों ने इस बारे में यूरोपीय आयोग को पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि अगर दूसरे देश संधि के नए रूप को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते हैं, तो स्पेन खुद को इससे अलग कर लेगा। रिबेरा ने पोलिटिको.ईयू से कहा- हमें इस मामले में होने वाली वार्ता के सफल होने की ज्यादा आशा नहीं है।

यूरोपीय आयोग ने जो पोजिशन पेपर तैयार किया है, उसमें प्राकृतिक गैस से बनने वाली बिजली के क्षेत्र में होने वाले निवेश के लिए दस साल तक संरक्षण जारी रखने की बात कही गई है। इसमें कहा गया है कि अगर संधि को नया रूप देने पर वार्ता टलती रहती है, तो इस पूरे दशक में ये संरक्षण जारी रखा जाना चाहिए।

फ्रांस ने भी स्पेन की तरह इस मामले में सख्त रुख अख्तियार किया है। फ्रांस सरकार ने पिछले दिसंबर में ही आयोग को एक पत्र भेजा था, जिसमें संधि को आधुनिक रूप देने की धीमी गति पर एतराज जताया गया था। इसमें ईयू से कहा गया था कि अगर 2021 के आखिर तक इस मामले में कोई निर्णायक प्रगति नहीं होती है, तो ईयू को इस संधि से हट जाना चाहिए। लक्जमबर्ग भी संधि को जलवायु परिवर्तन रोकने की जरूरतों के मुताबिक ढालने की वकालत कर रहा है। उसने यूरोपीय आयोग की तरफ से तैयार दस्तावेज को कमजोर करार दिया है, हालांकि उसने उम्मीद जताई है कि इसमें आगे सुधार किया जाएगा। जर्मनी का कहना है कि किसी भी रूप में एनर्जी चार्टर ट्रिटी का इस्तेमाल जलवायु संरक्षण या ऊर्जा के स्रोत बदलने के लक्ष्यों के खिलाफ नहीं होना चाहिए।

लेकिन नीदरलैंड्स इस संधि में ज्यादा बदलाव नहीं चाहता। उसने यूरोपीय आयोग के दस्तावेज का समर्थन किया है। मध्य यूरोप के ज्यादातर देश भी यही चाहते हैं कि निवेश संरक्षण को चरणबद्ध ढंग से खत्म किया जाए। इन देशों में हंगरी, स्लोवाकिया, पोलैंड, चेक गणराज्य और रोमानिया शामिल हैं। स्लोवाकिया ने कहा है कि हम किसी ऐसी समयसीमा का समर्थन नहीं कर सकते, जिससे गैस क्षेत्र में निवेश में रुकावट आए। इन देशों की यह राय भी है कि इस संधि को इस साल के अंत तक नया रूप देने की कोशिश जल्दबाजी भरी है।

यह पहले से जाहिर है कि जलवायु परिवर्तन रोकने की जितनी चिंता पश्चिमी यूरोप के देश को है, उतनी मध्य या पूर्वी यूरोपीय देशों को नहीं है। ये देश मौजूदा ऊर्जा नीति के तहत अपने यहां निवेश को ज्यादा अहमियत देते हैँ। इसलिए जानकारों को आशंका है कि इस मामले में कोई आम सहमति नहीं बन सकेगी। उस हाल में पश्चिम यूरोप के कई देश इस संधि से सचमुच खुद को बाहर कर सकते हैं।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें