अप्रैल, 2002 में उसने 12 साल बाद एक संवाददाता सम्मेलन किया था जिसमें प्रभाकरन की जीवनी 'इनसाइड एन एल्यूसिव माइंड प्रभाकरन' के लेखक एमआर नारायणस्वामी भी थे।
नारायणस्वामी कहते हैं, "हमने लिट्टे के कैंप में रात बिताई। सुबह उठकर कुएं के पानी से नहाए। मैंने 32 साल के अपने पत्रकार जीवन में इतनी सिक्योरिटी इससे पहले कभी नहीं देखी। उन्होंने हम सब पत्रकारों को एक-एक करके कमरे में बुलाया। हमारे पेन, कागज, पेंसिल और नोटबुक को उन्होंने बहुत बारीकी से देखा। बल्कि नोटबुक और पेन तो उन्होंने ले ही लिए।"
"हम सबकी उन्होंने अलग-अलग तस्वीर खींची और कैमरामैन से कहा कि वह अपने कैमरों को वहां रखे एक तराजू पर रखें ताकि उनका वजन ले सकें। बाद में हमें पता चला कि उन्हें हर कैमरे का ओरिजनल वजन पता था। वो ये देखना चाह रहे थे कि किसी कैमरे में कोई ऐसी चीज तो नहीं लगी है, जिसकी वजह से उसका वजन बढ़ा हुआ है। उन्होंने हमारे हाथों को दबा-दबाकर देखा कि कहीं इनके मसल्स तो नहीं हैं। कहीं ये प्रशिक्षित लोग तो नहीं हैं, जो पत्रकारों के रूप में वहां आए हैं।"
साइनाइड कैप्सूल
प्रभाकरन का पहला हथियार था गुलेल जिससे वह चिड़ियों, गिरगिटों और गिलहरियों को मारा करता था। उसके बाद उनके पास एक एयरगन आ गई थी जिस पर अभ्यास करते-करते उसने अपना निशाना गजब का बना लिया था।
प्रभाकरन के जीवनी लेखक नारायणस्वामी कहते हैं, "कभी-कभी प्रभाकरन अपनी कमीज के भीतर रिवॉल्वर रखकर धीरे-धीरे चला करते थे और अचानक तेजी से मुड़कर एक काल्पनिक दुश्मन पर निशाना लगाया करते थे। बाद में एलटीटीई ने आदेश दिया था कि उसके सभी लड़ाकों के पास चमड़े का होल्सटर होना चाहिए। इसका आइडिया प्रभाकरन को हॉलीवुड फिल्मों से मिला था।"
उसका हुक्म था कि एलटीटीई का हर लड़ाका अपने गले में साइनाइड कैप्सूल पहनकर चले और पकड़े जाने की स्थिति में उसे खाकर अपनी जान दे दे। उसकी गर्दन में भी काले धागे से एक साइनाइड कैप्सूल टंगा रहता था जिसे वह अक्सर अपनी कमीज की जेब में एक आईडेंटिटी कार्ड की तरह डाल लेता था।
प्रभाकरन को खाना बनाने का शौक था। अपने चेन्नई प्रवास के दौरान शाम को प्रभाकरन अपने साथियों के साथ सब्जियां काटता था। उसका प्रिय भोजन था चिकन करी। लेकिन मुश्किल के दिनों में वह ब्रेड और जैम से भी काम चला सकता था। वह साफ पानी के बारे में हमेशा सतर्क रहता था और कभी भी बिना उबाले पानी नहीं पीता था।
बैठकों के दौरान वह सिर्फ सोडा पिया करता था और वह भी तब जब बोतल उनके सामने खोली जाए। साल 1987 में जब प्रभाकरन जाफना में इरोस के दफ्तर गया तो उसके प्रमुख बालाकुमार ने उन्हें पीने के लिए कोक ऑफर की। उनका साथी एक ट्रे में कोक की तीन बोतलें और बॉटल ओपनर लेकर आया।
प्रभाकरन ने एक बोतल खोली और बालाकुमार की तरफ बढ़ाई। बालाकुमार ने जब तक कोक का एक घूंट नहीं ले लिया तब तक प्रभाकरन ने अपने लिए बोतल नहीं खोली। नारायणस्वामी कहते हैं एक बार उन्होंने अपने एक दोस्त से कहा था, "मैं चाय तभी पीता हूं अगर उसे मैंने स्वयं या फिर मेरी पत्नी ने बनाया हो।"
सफाई का जुनून
वह रोज अपनी दाढ़ी बनाता था। जैसे-जैसे एलटीटीई का सितारा परवान चढ़ा, प्रभाकरन का सफाई के प्रति जुनून भी बढ़ता गया। वह जब भी किसी सोफे पर बैठता, तो सबसे पहले उसके हत्थे पर लगी गर्द साफ करता था। उसको मकड़ी के जालों से नफरत थी। देखते ही वह उन्हें साफ करने का आदेश देता था।
सुव्यवस्था को वह इतनी गंभीरता से लेता था कि एलटीटीई के चेन्नई दफ्तर में सभी कमरों और आधा दर्जन मोटर साइकिलों की चाबियां एक निश्चित स्थान पर टंगी रहती थीं। उसके साथियों को निर्देश थे कि टॉयलेट्स हर हालत में साफ-सुथरे रहने चाहिए।
प्रभाकरन एक बार चेन्नई में तमिल नेता नेदुमारन के घर ठहरा था। एक दिन नेदुमारन ने देखा कि वह कुछ कपड़े धो रहा है, जो उसके अपने नहीं हैं। उन्होंने पूछा कि यह आप क्या कर रहे हैं? प्रभाकरन का जवाब था, "मैं आज खाली हूं। इसलिए सोचा कि अपने साथियों के कपड़े धो दिए जाएं।"
चेन्नई के एक मशहूर पत्रकार सदानंद मेनन का कहना है कि उन्होंने प्रभाकरन से ज्यादा शांत इंसान नहीं देखा। भारत में सीएनएन की पूर्व ब्यूरो प्रमुख अनीता प्रताप का भी यही मानना है।
एक बार प्रभाकरन का इंटरव्यू लेने के बाद उन्होंने लिखा था, "मुझे तो वह बेइंतहा साधारण इंसान लगे। हल्के नीले रंग की कमीज और सिलेटी पैंट पहने प्रभाकरन को बहुत आसानी से एक तमिल व्यापारी समझने की गलती की जा सकती थी।"
जब भी वह पत्रकारों को इंटरव्यू देता, तो अपने सामने एक कलाई घड़ी रखता था और जैसे ही तय किया गया समय समाप्त होता, वह इशारा करता था कि बातचीत बंद कर दी जाए। उसकी याद्दाश्त फोटोग्राफिक थी। जिससे वह एक बार मिल लेता था, उसे कभी नहीं भूलता था।
साल 1986 में जब भारत-श्रीलंका समझौते पर मंत्रणा हो रही थी तो प्रभाकरन को भारत लाने के लिए भारत ने श्रीलंका की अनुमति से भारतीय वायुसेना के दो हेलिकॉप्टर जाफना भेजे थे। उसमें भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हरदीप पुरी भी गए थे। वो आजकल नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में शहरी विकास मंत्री हैं।
एक एलटीटीई सदस्य ने हरदीप पुरी के कान में फुसफुसाया, "आप हमारे राष्ट्रीय खजाने को साथ ले जा रहे हैं।" पुरी ने तुरंत जवाब दिया, "मैं आपको वचन देता हूं कि हम जिस जगह से प्रभाकरन को ले जा रहे हैं, उसी जगह उन्हें छोड़कर जाएंगे, चाहे बातचीत का परिणाम कुछ भी हो।"
चपाती और पिस्तौल
चेन्नई हवाई अड्डे के वीआईपी लाउंज में हरदीप पुरी ने यह सोचकर चिकन करी और चावल का ऑर्डर किया कि ये चीजें प्रभाकरन को पसंद आएंगी। लेकिन प्रभाकरन ने कहा कि वह चपाती खाएगा, चावल नहीं क्योंकि इसको खाने से पिस्तौल का ट्रिगर दबाने वाली उंगली पर असर पड़ता है।
दिल्ली पहुंचने पर उसे अशोक होटल में ठहराया गया। 25 जुलाई को हरदीप पुरी ने उन्हें समझौते की शर्तें पढ़कर सुनाईं, जिसका प्रभाकरन के साथी बालासिंघम ने उनके लिए तमिल में अनुवाद किया। इसे सुनते ही प्रभाकरन ने ऐलान किया कि ये शर्तें उसे मान्य नहीं हैं और वह तमिल ईलम की मांग नहीं छोड़ेगा।
प्रभाकरन ने मांग की कि बातचीत में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमजीआर को भी शामिल किया जाए। राजीव गांधी ने उनकी मांग मान ली। एमजीआर तुरंत दिल्ली पहुंचे। राजीव गांधी ने अपने अफसरों पर दबाव बनाया कि प्रभाकरन को समझौते के लिए किसी भी तरह से मनाया जाए।
उनका कहना था, "वह जिद्दी जरूर हैं, लेकिन इस समझौते में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।" प्रभाकरन और उनके प्रतिनिधिमंडल को किसी पत्रकार से नहीं मिलने दिया गया। उसको यह आभास हुआ कि उनसे जबरदस्ती समझौते पर दस्तखत कराए जा रहे हैं। बहुत मुश्किल से उसने राजीव गांधी से मिलने के लिए तैयार करवाया गया।
तमिलनाडु के एक मंत्री और उसका साथी बालासिंघम उसके साथ गए। प्रभाकरन ने कहा श्रीलंका सरकार पर विश्वास नहीं किया जा सकता। राजीव गांधी ने कहा कि वह तमिलों के हित के लिए काम कर रहे हैं। अंतत : प्रभाकरन भारत-श्रीलंका समझौते को एक मौका देने के लिए तैयार हो गया।
नारायणस्वामी बताते हैं कि राजीव गांधी इससे बहुत खुश हुए। उन्होंने तुरंत प्रभाकरन के लिए खाना मंगवाया। जब वह उनके घर से निकलने लगा तो राजीव ने राहुल गांधी को बुलाया और उनसे अपनी बुलेटप्रूफ जैकेट लाने के लिए कहा। उन्होंने वह जैकेट प्रभाकरन को देते हुए मुस्कराते हुए कहा, "आप अपना ख्याल रखिएगा।"
राजीव गांधी के मंत्रिमंडल के एक सदस्य ने उनसे कहा कि प्रभाकरन को तब तक भारत में रखा जाए, जब तक एलटीटीई के लोग हथियार नहीं डाल देते। राजीव गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा, "प्रभाकरन ने मुझे अपनी जुबान दी है। मैं उस पर विश्वास करता हूं।"
प्रभाकरन ने वह वचन कभी पूरा नहीं किया और अंतत: राजीव गांधी की हत्या करने का आदेश दे दिया। जाफना वापस लौटने से पहले प्रभाकरन ने मद्रास में लेफ्टिनेंट जनरल देपिंदर सिंह से मुलाकात की थी।
देपिंदर सिंह बताते है, "मेरे प्रति सम्मान दिखाने के लिए प्रभाकरन कमरे के बाहर अपनी रबड़ की चप्पलें उतार कर अंदर आया। वो मुझे थोड़ा परेशान दिखाई दिया। उसने मुझसे साफ कहा कि वो अब भारतीय विदेश मंत्रालय और रॉ पर कभी विश्वास नहीं करेगा।
मैंने उनसे पूछा कि आप कब अपने हथियार हमें सौंपेंगे (मैंने जानबूझ कर हथियार डालने शब्द का प्रयोग नहीं किया), प्रभाकरन ने कहा कि वो अपनी सबसे भारी मशीनगन मेरे सामने पेश करेगा। प्रभाकरन ने ये वादा कभी पूरा नहीं किया। कुछ दिनों बाद जब एलटीटीई के छापामारों ने भारतीय सैनिकों के सामने हथियार डाले तो प्रभाकरन मौजूद नहीं था।"
अपनी जिदगी की आखिरी लड़ाई में प्रभाकरन चारों तरफ से श्रीलंकाई सैनिकों से घिर गया था। एक गोली उनके माथे को चीरती हुई चली गई थी, जिसने उनके कपाल को क्षत-विक्षत कर दिया था। इसके अलावा उसके शरीर पर चोट का एक भी निशान नहीं था। प्रभाकरन का शरीर उसी जगह पड़ा था, जहां कुछ घंटे पहले उनकी मौत हुई थी।
इलाके में फैली गंदगी के बावजूद उनकी वर्दी बिल्कुल साफ और बेदाग थी। उनकी कमर पर एक बेल्ट लगी थी जिससे एक होलस्टर्ड पिस्तौल लटकी थी। साथ में थे छह न इस्तेमाल किए हुए कारतूस। उनके सीने पर धातु का एक कार्ड लगा था, जिस पर 001 नंबर लिखा था।
उसके पास मिले छोटे बैग में अंगूर की महक वाला हैंड लोशन भी मिला था जिसे सिंगापुर से खरीदा गया था। पास ही मधुमेह के इलाज की कुछ गोलियां भी पड़ी हुई थीं।
प्रभाकरन पर एक और किताब लिखने वाले मेजर जनरल राज मेहता कहते हैं, "अपनी अंतिम लड़ाई में प्रभाकरन मोलाएतुवू क्षेत्र में तीन तरफ से घिर गया था। चौथी तरफ समुद्र था जहां श्रीलंका की सेना ने अपना जाल बिछा रखा था। कहने का मतलब ये कि बचने की गुंजाइश थी ही नहीं। श्रीलंकाई सेना रेडियो पर उसकी बातचीत सुन रही थी। उन्हें प्रभाकरन की लोकेशन का पूरा अंदाजा था। उन्होंने उसको बिल्कुल 'बैक टू द वॉल' कर दिया था।"
प्रभाकरन की मौत के बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे ने वहां की संसद में ऐलान किया था, "आज के बाद श्रीलंका में कोई अल्पसंख्यक नहीं होगा। अब से यहां सिर्फ दो किस्म के लोग रहा करेंगे। एक जो अपने देश को प्यार करते हैं और दूसरे वो जिन्हें उस धरती से कोई प्यार नहीं है जहां उनका जन्म हुआ।"