नेपाल में शेर बहादुर देउबा सरकार बुधवार को सत्ता में अपनी पहली सालगिरह मनाएगी। पिछले साल 13 जुलाई को देउबा ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। लेकिन सालगिरह से ठीक पहले देउबा पर बेहतर शासन देने में नाकाम रहने के आरोप लगे हैं। ये इल्जाम सिर्फ विपक्ष की तरफ से ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी नेपाली कांग्रेस एक धड़े ने भी लगाए हैं।
लेकिन देउबा के लिए चिंता की बड़ी वजह नेपाली कांग्रेस के एक धड़े की तरफ से उछाले गए सवाल हैं। नेपाली कांग्रेस के शेखर कोइराला गुट सरकार ने संविधान परिषद संशोधन बिल पेश करने को लेकर सरकार के इरादे पर सवाल उठाए हैं। देउबा सरकार ने यह बिल संसद में पेश किया है। इसका मकसद संविधान परिषद की बैठक आयोजित करने और उसमें निर्णय लेने की प्रक्रिया को आसान बनाना है। पूर्व केपी शर्मा ओली ने भी यह विधेयक संसद में पेश किया था। लेकिन तब नेपाली कांग्रेस ने उसका पुरजोर विरोध किया था। तब नेपाली कांग्रेस ने इस बिल को संविधान और कानून के राज पर हमला बताया था।
नेपाली कांग्रेस के शेखर कोइराला गुट ने अब पूछा है कि आखिर पार्टी जिस बिल के खिलाफ थी, उसे देउबा सरकार ने संसद में क्यों पेश किया है। इस खेमे ने पार्टी अध्यक्ष के रूप में देउबा की भूमिका भी आलोचना की है। नेपाली कांग्रेस की केंद्रीय कार्यसमिति की बैठक में कोइराला ने आरोप लगाया कि कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ गठबंधन के कारण नेपाली कांग्रेस की विचारधारा कमजोर पड़ी है। इसी वजह से मई में हुए स्थानीय चुनावों में पार्टी सही उम्मीदवारों का चयन नहीं कर पाई।
खबरों के मुताबिक सोमवार को कार्यसमिति की बैठक में जब देउबा पहुंचे, तो उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। बैठक में पार्टी उपाध्यक्ष धनराज गुरुंग और महासचिव गगन थापा ने भी शेखर कोइराला गुट का समर्थन किया। पार्टी की छात्र शाखा के नेताओं ने भी देउबा के रुख को लेकर विरोध जताया। उन्होंने आरोप लगाया कि देउबा ने जानबूझ कर नेपाल स्टूडेंट्स यूनियन की महासभा की बैठक नहीं बुलाई है।