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चीन की चिंता: अमेरिका कर रहा है उसके बारे में गहन अध्ययन, उठी चीनी शिक्षाशास्त्रियों पर जारी 'प्रतिबंधों' में ढील देने की मांग

Mon, 24 May 2021 03:47 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग

सार

चीन में अमेरिकी स्टडीज के विशेषज्ञों की कमी को लेकर चिंता नई नहीं है। 2005 में इतिहासकार रेन दोंगलाई ने इस पर दुख जताया था कि 1980 के दशक में चीन के जो मेधावी छात्र अमेरिका पढ़ने गए थे, उनमें से ज्यादातर ने वहां जाकर चीन के बारे में पीएचडी थीसिस लिखी...
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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग - फोटो : ANI (File)
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विस्तार
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चीन के शिक्षाशास्त्रियों ने अमेरिका और चीन के बीच एक-दूसरे से संबंधित ज्ञान की गहरी खाई को लेकर देश की सरकार को आगाह किया है। खास कर उन्होंने इस तरफ ध्यान खींचा है कि अमेरिका में चीन के बारे मे जितनी गहराई से अध्ययन किया जा रहा है, चीन में उतनी ही शिद्दत के साथ अमेरिका के बारे में स्टडी नहीं हो रही है।

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सबसे पहले ये चिंता पीकिंग यूनिवर्सिटी में स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज के अध्यक्ष वांग जिसी ने जताई। इस महीने के मध्य में उन्होंने कहा- ‘मैं इसे देख कर शर्म और असहजता महसूस करता हूं कि हमारी अमेरिकन स्टडीज बेहद कमजोर है। चीन में लोग अकसर कहते हैं कि अमेरिका के बारे में हमारा अध्ययन चीन के बारे में अमेरिकी अध्ययन की तुलना में ज्यादा व्यापक और गहरा है। लेकिन मेरी राय में ये बात गलत और असत्य है।’

वांग एक वर्चुअल समारोह में चीनी कूटनीतिकों को संबोधित कर रहे थे। मौका हांगझाऊ यूनिवर्सिटी में अमेरिकन स्टडी सेंटर के उद्घाटन का था। हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक वांग के इस भाषण के बाद देश में इस विषय पर गहरी चर्चा छिड़ गई है। इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि आने वाले समय में अमेरिका और चीन के बीच ताकत दिखाने की होड़ जारी रहेगी। इस चर्चा में ज्यादातर विशेषज्ञ वांग की राय से सहमति जता रहे हैं। उन्होंने इस तरफ भी ध्यान खींचा है कि चीन में जो अमेरिका विशेषज्ञ तैयार होते हैं, उनमें से बहुत से विदेश जाकर बस जाते हैं। वांग ने भी अपने भाषण में कहा- ‘यह दुखद स्थिति है कि जो चीनी छात्र समाज विज्ञान पढ़ने के लिए अमेरिका गए, वे वहां जाकर चाइनीज स्टडी करने लगे। अमेरिका को भी ऐसे लोगों की जरूरत है, जिन्हें चीन के बारे में गहरी जानकारी हो।’
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चीन में अमेरिकी स्टडीज के विशेषज्ञों की कमी को लेकर चिंता नई नहीं है। 2005 में इतिहासकार रेन दोंगलाई ने इस पर दुख जताया था कि 1980 के दशक में चीन के जो मेधावी छात्र अमेरिका पढ़ने गए थे, उनमें से ज्यादातर ने वहां जाकर चीन के बारे में पीएचडी थीसिस लिखी। दिवंगत रेन दोंगलाई उन पहले चीनी विद्वानों में थे, जिन्हें सबसे पहले अमेरिका की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का मौका मिला था।

अब चल रही चर्चा में नानजिंग यूनिवर्सिटी स्थित अंतरराष्ट्रीय संबंध संस्थान के निदेशक झू फेंग ने कहा है कि मेधावी चीनी छात्रों का बाहर जाकर बस जाना अब भी एक बड़ी समस्या है। खासकर अमेरिका पढ़ने गए छात्रों ने ऐसा किया है। झू ने कहा है कि चीन के बारे में अमेरिका संबंधी अध्ययन की बहुत कमी है। अमेरिका में जितने तथ्यात्मक ढंग से चीन के इतिहास और उसकी भावी रणनीति का अध्ययन किया जा रहा है, अमेरिकी अध्ययन के मामले चीन उससे बहुत पीछे है।

चीन विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन में समाज विज्ञान के अध्ययन में शैक्षिक स्वतंत्रता का अभाव यहां एक बड़ी समस्या है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययन जैसे क्षेत्रों में यहां शिक्षाशास्त्रियों को कई तरह की पाबंदियां झेलनी पड़ती हैं। बीते मार्च में पीकिंग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर जिया छिंगगुओ ने ये समस्या सीधे चीन सरकार की राजनीतिक सलाहकार समिति के सामने उठाई। जिया भी इस समिति के सदस्य हैं। उन्होंने दो टूक कहा कि चीनी शिक्षाशास्त्रियों पर जारी ‘अत्यधिक’ प्रतिबंधों में ढील दी जानी चाहिए।

विश्लेषकों का कहना है कि चीन की असली समस्या यही है। प्रतिबंधों के माहौल में शिक्षा और ज्ञान के विकास का काम नहीं हो सकता। ऐसे में अकादमिक स्वतंत्रता की चाह में चीनी विद्वान विदेशों में बसना पसंद कर रहे हैं।

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