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दक्षिण चीन सागर में ड्रैगन की दादागीरी के सामने पस्त हुए 10 देश

Mon, 25 Jul 2016 04:01 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
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दुनिया भर के लिए समंदर के रास्ते व्यापार के लिए अहम दक्षिण चीन सागर में ड्रैगन की दादागीरी के सामने विरोधी पस्त होते दिख रहे हैं। इलाके में दावेदारी रखने वाले देशों का चीन के खिलाफ विरोध भी ठंडा पड़ रहा है। इस इलाके में चीन के मंसूबों की खिलाफत करने वाले दस देशों को संगठन (एसोसिएशन ऑफ साउथ-ईस्ट एशियन नेशंस) बनाया गया था, अब इस संगठन ने भी चीन के तेवर के आगे घुटने टेक दिए हैं। ले देकर इनके पास चीन की आलोचना करने का काम था, वह भी इन्होंने बंद कर दिया है। इन देशों के रुख से चीन अपनी कूटनीतिक जीत साबित हुई है।
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दरअसल, दक्षिण चीन सागर को लेकर चीन के विदेश मंत्री और विरोध जताने वाले देशों के विदेश मंत्री और समकक्षों की बैठक हुई, जिसमें 10 देशों बीच ही मतभेद पैदा हो गए। इससे चीन को लाभ मिला। देशों ने इलाके को लेकर चिंता तो जाहिर की लेकिन इलाके में चीन के दावे को हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल ने खारिज करने वाली बात तक का जिक्र नहीं किया। 

दक्षिण चीन सागर इलाके में चीन के अलावा फिलीपींस, मलेशिया, वियतनाम और ब्रुनेई भी अपना दावा ठोंकते हैं। इन देशों के पास आसियान में चीन की कड़ी आलोचना करने का मौका था, कंबोडिया और लाओस भी चीन की आलोचना कर सकते थे, लेकिन सभी देशों के आपसी मतभेदों ने मामले पर पानी फेर दिया। आलम यह रहा कि इन देशों विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने मीडिया से भी मुखातिब होने तक की जरूरत नहीं समझी, इस माहौल को देखते हुए यही कहा जा रहा है कि फिलहाल बाजी चीन के हाथ में है, और चीन इस जीत का जश्न मना सकता है।
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अंतर्राष्ट्रीय कानून का धड़ल्ले से उल्लंघन कर रहा है चीन

- फोटो : Reuters
इससे पहले फिलीपींस की याचिका पर सुनवाई के बाद दिए फैसले में संयुक्त राष्ट्र समर्थित ट्रिब्यूनल ने कहा है कि दक्षिण चीन सागर पर चीन के एकाधिकार के दावे का कोई भी कानूनी आधार नहीं है। ट्रिब्यूनल का यह फैसला चीन के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा था। इस फैसले के बाद दक्षिण चीन सागर विवाद और गहराने के आसार थे क्योंकि चीन ने ट्रिब्यूनल के फैसले को मानने से इनकार कर दिया था। फैसला आने के तत्काल बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा था कि वह यह फैसला किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे और दक्षिण चीन सागर पर हमारे रुख में कोई बदलाव नहीं आएगा।

पांच जजों वाले ट्रिब्यूनल ने जोर देकर कहा था उनका फैसला अंतिम और बाध्यकारी है। ट्रिब्यूनल ने चीन को दक्षिण चीन सागर में अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करने का दोषी भी पाया था। ट्रिब्यूनल ने दक्षिण चीन सागर में निर्माण कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए चीन की कड़ी आलोचना की थी।
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क्या है विवाद?

- फोटो : Reuters
दरअसल चीन 1940 के दशक के एक नक्शे को आधार बनाकर दक्षिण चीन सागर के लगभग 90 फीसदी हिस्से पर अपना दावा जताता रहा है। उसके मुताबिक नाइन डैश लाइन के दायरे में आने वाले लगभग पूरे समुद्री क्षेत्र पर उसका अधिकार है और उसके मछुआरे सदियों से इस समुद्री क्षेत्र का इस्तेमाल करते रहे हैं। 

चीन ने अपने दावे को मजबूती देने के लिए दक्षिण चीन सागर के कोरल रीफ को तेजी से कृत्रिम द्वीपों में भी बदल दिया। फिलीपींस, वियतनाम, ताईवान, मलयेशिया और ब्रुनेई भी दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावों का कड़ा विरोध करते रहे हैं। इन देशों के समर्थन में अमेरिका भी आ गया है, उसने अपने युद्ध पोत भी इस क्षेत्र में भेजे दिए।

इलाके में चीन की बर्चस्व होता है तो भारत के समंदर के रास्ते होने वाले व्यापार पर भी फर्क पड़ सकता है। क्योंकि समुद्र के रास्ते होने वाले भारत के कुल व्यापार का करीब 55 फीसदी इसी क्षेत्र से होता है।
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