अमेरिकी बुद्धिजीवियों के बीच और मीडिया एवं यहां सोशल मीडिया में पिछले दो दिन चली चर्चाओं पर गौर करें, तो साफ होता है कि अमेरिका का एक बड़ा तबका चीन के लिए बन रहे अनुकूल मौकों को लेकर चिंतित है।
इन चर्चाओं का सार टीवी चैनल सीएनएन की वेबसाइट पर उसके विश्लेषक जेम्स ग्रिफिथ की इस टिप्पणी में देखने को मिला- ‘जहां बाकी दुनिया कोरोना वायरस से निपटने में लगी हुई है, चीन अब आगे निकलता जा रहा है। वह अपनी अर्थव्यवस्था में फिर से जान फूंक रहा है और अपने भू-राजनीतिक मकसदों को हासिल करने की तरफ बढ़ रहा है।’ ग्रिफिथ ने कहा कि अमेरिका में राष्ट्रपति पद के हस्तांतरण को लेकर लंबे समय तक जारी रहे भ्रम और अव्यवस्था की आशंकाओं के कारण ये स्थिति और गंभीर हो गई है।
विश्लेषकों ने कहा है कि बुधवार रात वाशिंगटन में दिखे “आतंकवाद” और अवैध ढंग से “सत्ता कब्जा करने की कोशिश” के बाद लंबे समय तक अमेरिकी जनता इसी मुद्दे की चर्चा में लगी रहेगी। देश की सीमा के बाहर क्या हो रहा है, उस बारे में सोचने का फिलहाल उसके पास कोई वक्त नहीं है। जबकि मीडिया की चर्चाओं में ध्यान दिलाया गया है कि अमेरिका में जारी भ्रम का लाभ उठाते हुए चीन अपने यहां निवेश के लिए बड़े समझौतों को अंजाम देने में सफल रहा है।
पिछले दिनों उसने यूरोपियन यूनियन के साथ निवेश का समझौता किया, जिसके बाद चीन का सीधा मुकाबला करने की अमेरिकी क्षमता संभवतया घट गई है। इसके अलावा चीन ने हांगकांग में विपक्षी कार्यकर्ताओं पर बड़ी कार्रवाई की है। उनमें से दर्जनों को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन इन तमाम बातों पर अमेरिका में ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है।
निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने ईयू-चीन समझौते और हांगकांग में चीन की कार्रवाई की आलोचना की है। हांगकांग के मामले में विदेश मंत्री माइक पोम्पियो को बुधवार को बयान जारी करना था, लेकिन कैपिटल हिल पर हुई घटना के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए।
विश्लेषकों का कहना है कि वैसे भी जुबानी आलोचना की चीन इन दिनों परवाह नहीं कर रहा है। इसके बजाय वह अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटा है। ईयू-चीन का समझौता होने से पहले जो बाइडन की टीम ने ईयू से कहा था कि वह बाइडन के राष्ट्रपति बनने तक इंतजार करे। लेकिन चीन ने ईयू के सामने नए आकर्षक प्रस्ताव रख दिए और ईयू ने समझौता कर लिया। चीन ने इसे अपनी एक बड़ी जीत माना है।
यहां अनेक जानकार चीन की मजबूत हुई हालत के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को भी दोषी ठहराते हैँ। उनके मुताबिक ट्रंप की नीति चीन को गले लगाने और उसके खिलाफ सख्ती के बीच भटकती रही। अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में ट्रंप ने चीन के खिलाफ आक्रामक मुहिम छेड़ दी। उस पर प्रतिबंध लगाए और चीन विरोधी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की कोशिश की।
लेकिन नीतियों के मामले में उनके अस्थिर रुख के कारण ऑस्ट्रेलिया के अलावा किसी और देश ने उनके चीन विरोधी गठबंधन में शामिल होने का उत्साह नहीं दिखाया। जानकारों का कहना है कि चीन ने जिस तरह ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ व्यापारिक कार्रवाई कर उसे सबक सिखाया, उससे मुमकिन है कि अब ऑस्ट्रेलिया भी अपने रुख पर पछता रहा हो।
अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना है कि चीन ये दावा करता है कि वह अमेरिका की तरह किसी और देश के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देता। हालांकि यह सच नहीं है, लेकिन उसकी बात से आज दुनिया के बहुत से देश प्रभावित दिखते हैं। जबकि चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से दुनिया का शक्ति-संतुलन बदलने की कोशिश कर रहा है।
इन विशेषज्ञों का कहना है कि आज चीन को दूसरी महाशक्ति का दर्जा हासिल हो गया है, तो इसमें उसके अपने उदय से ज्यादा अमेरिकी में मौजूद अफरा-तफरी और सामाजिक विभाजन का योगदान है। कोरोना महामारी से निपटने में अमेरिका की नाकामी से भी चीन अपने मॉडल को दुनिया में लोकप्रिय बनाने में एक हद तक सफल हुआ है।
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी इस वर्ष अपना शताब्दी वर्ष मनाएगी। कम्युनिस्ट पार्टी ने वादा किया था कि इस साल तक वह देश को एक साधारणतया समृद्ध देश बना देगी। पिछले साल उसने देश से गरीबी खत्म करने का दावा किया। अमेरिकी जानकारों का कहना है कि ताजा हालात के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस साल यह दावा करने की स्थिति में होंगे कि उन्होंने अपनी पार्टी का वादा निभा दिया है। दूसरी तरफ अमेरिका कोरोना महामारी, राजनीतिक अव्यवस्था और दुनिया में अपने घटते प्रभाव का सामना कर रहा है। यह चीन के लिए मुस्कराने का मौका है।