अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों के विदेश मंत्रियों की हुई तीसरी बैठक का नतीजा तालिबान शासन के लिए संतोषजनक रहा। ऐसी राय अफगान मामलों के विशेषज्ञों ने जताई है। इस बार की बैठक की मेजबानी चीन ने की। पूर्वी चीन के अनहुई प्रांत के तुनक्शी शहर में ये बैठक हुई। इस बैठक से यह साफ संकेत मिला कि धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय तालिबान शासन को अफगानिस्तान की वैध सरकार के रूप में स्वीकार करने की ओर बढ़ रहा है। एक अन्य संकेत यह मिला कि अफगान मामलों में चीन की भूमिका बढ़ रही है।
इस सहमति के मुताबिक बैठक में शामिल देशों ने अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार की तरफ से किए गए शासन संबंधी उपायों को मान्यता दी, वे अफगानिस्तान के आर्थिक पुननिर्माण और स्वतंत्र विकास को सहायता देने पर रजामंद हुए, और अमेरिका एवं पश्चिमी देशों से आग्रह किया कि जब्त की गई संपत्तियों को वे तुरंत अफगानिस्तान को लौटा दें। भागीदार विदेश मंत्रियों ने अफगानिस्तान में आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ाने का संकल्प भी जताया।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस क्षेत्र में चीन ने अफगानिस्तान को अपनी रणनीति में कितना महत्त्व दे रहा है, यह इससे जाहिर हुआ कि खुद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने विदेश मंत्रियों की बैठक को संबोधित किया। शी ने कहा कि अफरातफरी से व्यवस्था की तरफ अपनी यात्रा में अफगानिस्तान अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। विश्लेषकों का कहना है कि चीन अब जल्द से जल्द अफगानिस्तान को अपनी महत्त्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) परियोजना में शामिल करना चाहता है। हाल में चीनी विदेश मंत्री वांग की अचानक हुई अफगानिस्तान यात्रा के दौरान ये घोषणा हुई थी कि अफगानिस्तान चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडॉर में शामिल होगा। यह कॉरिडॉर बीआरआई का ही हिस्सा है।
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि इस बार विदेश मंत्रियों की बैठक का दायरा बढ़ाया गया। इसमें दो मुस्लिम देश- कतर और इंडोनेशिया भी शामिल हुए। इसे भी एक खास बात समझा गया है कि यूक्रेन मुद्दे पर तीखे टकराव के माहौल में भी अमेरिका और रूस के प्रतिनिधि इस बैठक के दौरान आमने-सामने बैठे। इसके अलावा इस मौके पर चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के विदेश मंत्रियों की अलग से त्रिपक्षीय वार्ता हुई। बाद में एलान हुआ कि विदेश मंत्रियों की अगली बैठक 2023 की पहली तिमाई में उज्बेकिस्तान में होगी।