चीन में बच्चों के यौन शोषण को लेकर सरकार और अदालतों की लापरवाही अब यहां एक बड़ी बहस का मुद्दा बन गई है। यहां की मीडिया में इस बारे में गंभीर चर्चा हो रही है। शंघाई स्थित अंग्रेजी वेबसाइट सिक्स्थटोन.कॉम ने इस पर हैरत जताई है कि चीन में यौन शोषण के बारे में कोई राष्ट्रव्यापी आंकड़ा मौजूद नहीं है। लेकिन इस वेबसाइट के मुताबिक एक ताजा आधिकारिक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि लगभग 21 फीसदी तक बच्चे ऐसी घटनाओं का शिकार होते हैं।
इसमें कहा गया है कि उनमें से कई गंभीर मानसिक सदमे से गुजरते हैं। विशेषज्ञों ने कहा है कि यौन उत्पीड़न के दौरान बच्चों को पहुंचा शारीरिक जख्म तो कुछ दिन में ठीक हो जाता है, लेकिन मानसिक आघात लंबे समय तक उन्हें प्रभावित करता रहता है। इससे उनके व्यवहार में भी बदलाव आ सकता है।
विशेषज्ञों ने इस पर अफसोस जताया है कि चीन की अदालतें अकसर यौन शोषण के शिकार बच्चों को पहुंचे मानसिक या मनोवैज्ञानिक नुकसान की अनदेखी कर देती हैं। इस कारण इन बच्चों को समय पर कानूनी संरक्षण या डॉक्टरी सहायता नहीं मिल पाती।
बीजिंग स्थित एक लॉ फर्म ने हाल में बाल यौन उत्पीड़न के 184 मामलों में आए अदालती फैसलों का विश्लेषण किया। ये वो फैसले थे, जिनमें बच्चों के मानसिक या मनोवैज्ञानिक इलाज की जरूरत बताई गई थी। 2013 से 2020 के इन मामलों में 199 बच्चे शिकार बने थे।
चिंयांगचियान लॉ फर्म ने कहा है कि इस विश्लेषण से सामने आए नतीजे निराशाजनक हैं। इन नतीजों के मुताबिक सिर्फ 34 फीसदी पीड़ितों को मानसिक नुकसान का मुआवजा दिलाया गया। अदालतें अकसर मुआवजे की अर्जी को 'पर्याप्त कानूनी आधार ना होने' या 'पर्याप्त सबूत ना होने' की बात कहते हुए ठुकरा देती हैं। इस संस्था ने अपर्याप्त कानूनी आधार के तर्क को सबसे बड़ी समस्या बताया है।
इस लॉ फर्म के अध्ययन से यह भी सामने आया कि अकसर अदालतें बाल यौन उत्पीड़न के मामलों में हलकी सजाएं सुनाती हैँ। जिन मामलों का इस फर्म ने अध्ययन किया, उनमें बलात्कार की कोशिश समेत दूसरे यौन दुर्व्यवहार के दोषी 80 फीसदी अपराधियों को चार साल या उससे कम कैद सुनाई गई थी। जो आरोपी बलात्कार के दोषी पाए गए, उनमें से 68 फीसदी को छह साल या उससे कम की कैद सुनाई गई।
जानकारों का कहना है कि कानूनों को जिस ढंग से लिखा गया है, उससे अपराधियों से वित्तीय जुर्माना या इलाज का खर्च पीड़ितों को दिलवाना बहुत मुश्किल बना रहता है। कानून और अदालतों में हुई कानूनों की व्याख्या से फिलहाल चीन में यह प्रावधान है कि पीड़ित पक्ष आर्थिक मुआवजा, इलाज का खर्च, परिवहन खर्च, नर्सिंग फीस आदि अपराधी से मांग सकता है।
ऐसी याचिकाओं पर 60 से 90 फीसदी मामलों में कोर्ट का फैसला पीड़ित के पक्ष में होता है। लेकिन मानसिक या मनोवैज्ञानिक इलाज का खर्च दिलवाने में अदालतें अकसर नाकाम रहती हैं। लॉ फर्म के अध्ययन में सामने आया कि अदालतों ने सिर्फ 21 फीसदी पीड़ितों को ये खर्च दिलवाए।
लॉ फर्म के मुताबिक इसकी वजह यह है कि पीड़ित ऐसे खर्च को पाने का हकदार है, कोर्ट में यह साबित करने की जिम्मेदारी उसकी ही मानी जाती है। जबकि पीड़ित बच्चों के परिजनों को अकसर मानसिक या मनोवैज्ञानिक सदमे का सबूत इकट्ठा करने संबंधी जानकारी नहीं रहती।
फर्म ने जिन केसों का अध्ययन किया, उनमें सिर्फ 50 फीसदी परिवार ऐसे थे, जो अपना वकील रखने में सक्षम थे। बाकी 13 फीसदी पीड़ित परिवारों को गरीबी कोटा के आधार पर कानूनी सहायता उपलब्ध कराई गई। लेकिन 35 परिवार ऐसे थे, जो बिना वकील के कोर्ट में मौजूद हुए।
फर्म के मुताबिक जिन मामलों में अदालतों ने मुआवजा दिलवाया, उनमें दिलवाई रकम पीड़ितों की मांग से बहुत कम रही। फर्म ने अपनी रिपोर्ट में एक मामले का जिक्र किया है, जिसमें पीड़ित पक्ष ने 56,892 युआन पाने का दावा किया था, लेकिन उसे बतौर मुआवजा सिर्फ 2,795 युआन ही मिल सके।
अध्ययनकर्ताओं ने कहा कि इस समस्या को दूर करने के लिए कानूनी व्यवस्था की खामियां दूर करनी होंगी। जरूरत इस बात की है कि साक्ष्य को स्वीकार करने का पैमाना बदला जाए। साथ ही मानसिक नुकसान के लिए रकम तय करने के कायदे भी नए सिरे से तय हों।