तिब्बत से बौद्ध संस्कृति को खत्म करने के लिए चीन लगातार दमन और अत्याचार कर रहा है। बीते सप्ताह 21 से 23 फरवरी तक तिब्बती नववर्ष लोसर के दौरान चीन ने तिब्बतियों को उनके निर्वासित रिश्तेदारों से संपर्क नहीं करने दिया।
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चीन के मना करने के बाद भी जिन लोगों ने नववर्ष की शुभकामना देने के लिए जिससे संपर्क किया, उन पर जासूसी व देशद्रोह जैसे आरोप लगाकर पूछताछ की जा रही है। यहां तक कि तमाम तिब्बती लोगों ने अपने रिश्तेदारों को इस संबंध में पहले ही जानकारी दे दी थी कि उनसे लोसर के दौरान संपर्क नहीं किया जाए, क्योंकि चीन इस दौरान कड़ी निगरानी करने वाला है। यहां तक कि लोसर की शुरुआत से पहले 20 फरवरी को ल्हासा, जिगात्से और चामडो में हजारों लोगों के मोबाइल फोन की जांच की गई।
तिब्बत में अल्पसंख्यक हुए बौद्ध
तिब्बत राइट कलेक्टिव की एक रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलियाई सांसद जैनेट राइस लिखती हैं, तिब्बत के अंदर और बाहर हर जगह मौका मिलते ही चीनी अधिकारी तिब्बती बौद्धों को प्रताड़ित करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, चीन दस लाख से ज्यादा तिब्बती बौद्धों की हत्या कर चुका है।
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सीमावर्ती गांवों में सैनिक बसा रहा चीन
चीन भारत की सीमा से लगते तिब्बती गांवों में मौजूद बौद्ध लोगों को विस्थापित कर सैनिकों को बसा रहा है। खासतौर पर चीन यह चाल उन गांवों में चल रहा है, जिन गांवों पर भारत और भूटान भी दावा करते हैं। वहां इसे अभियान का रूप देकर काम चल रहा है।
क्रूरता से कुचला विरोध
1959 में मार्च में चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया था, जिसके विरोध में तिब्बत की जनता चीन के खिलाफ लड़ी, लेकिन चीन की सेना ने विरोध को कुचलते हुए तिब्बत पर कब्जा कर लिया था।